शुक्रवार, 7 मार्च 2008

रउरे बुढि़या के गलवा में क्रीम लागेला, हमरी नइकी के जरि गइलें भाग भाई जी

आज महिला दिवस ह। ईहो एकठो चोचलेबाजी बा। कौनो मुंह बनउले क जरूरत नइखैं। दुनिया भर में दुनिया भर क दिवस मनावै क फैशन स चल गइलि बा। ओही में एक फैशन ईहो हउवै। सरऊ लोग तरह-तरह क तमाशा करत हउवैं। चिढ़ावै के खातिन। कबौं लइकन के चिढ़इहैं, त कबौं बुढ़वन के, कबौं मजदूरन के चिढ़इहैं त कबौं किसानन के... भोजपुरी में एकगो कहावत ह कि ओढ़ौ के दुका नहीं, दरी बिछनौना। दुनिया भर क के गिनावै. अपने आसैपास देखिला, आसैपास का- तनी अपने घरहि में देखिला कि कइसन हाल बा महिला लोगन का। केहू जनमते बेंचि देत ह, केहू गरभ में ही मरवाइ देत ह, त केहू जिनगी भर मारि-मारि के कचूमर निकालि लेत ह।
त भइया ई कुल झांसा-पट्टी क खेल ह। जौन करै के चाही, तौन त केहू कुछ करत-धरत ना ह, महिला दिवस जरूर मनइहैं। अमीरी-गरीबी का खोदि-खोदि के समुंदर बनावत जात हउवैं, पइसा वालन के मेम इसनो-पाउडर चेंपि के रोज-रोज हाट-बाट, माल, मारकेट क धौरहरि मचउले हईं, गरीबन क बिटिया-मेहरारू गिट्टी तोड़त हईं, घास करति हईं, हर जोतत हईं, पत्ता-पन्नी बीनति हईं, त पेट-परदा चलत ह।
केतना महिला संगठन हउवैं, हर पार्टी में महिला विंग अलग से, केतना पंच-परधान मेहरारू हईं, अउर-त-अउर सोनिया गान्ही, मायावती बहिन जइसन दुनिया भर क चौधरानी अपने देश-मुलुक में गद्दी पर बइठि के खूब मजा काटति बानी, आ औरतन क हाल जस क तस बा। वोट लेवै के बेला में ई कुल औरति बनि जालीं, एकरे बाद पांच साल तक के पूछत बा, केहू नइखैं। अब त भइया ई कुल चिरकुटाई सुनत-सुनत जी पकि गइल बा। ई कुल महोखाबाजी अब तनिको बरदास्त ना होत बा। ऊ कुल आपन-आपन चमकीला खतोना बनाइ-बनाइ के हम लोगन के खूब भरमावत हउवैं। छोड़ा जाएदा उनहन क महिला-सहिला दिवस का बात-कुबात...... आवा तनी एही बहाने गीत-गवनई होइ जाय गोरख पांड़े के मुंह-राग से, उनहीं के सबदन में.....

पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइलें त बोले लगलें ना
तोहके खेतवा दिअइबों
तोहके फसलि उगइबो
दूसरे चुनउवा में जब उपरइलें त बोलें लगलें ना
तोहके कुइयां खनइबो
सब पियसिया मिटइबौ
तीसरे चुनउवा में चेहरा दिखइलें त बोले लगलें ना
तोहके महल उठइबों
ओमे बिजुरी लगइबों
अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तू बहुत कइला ना
तोहके अब न थकइबो
आपन हथवा उठइबो
जब हम ईहवों के किलवा ढहइबो त एही हाथे ना
तोहरो मटिया मिलइबो
आपन रजवा बनइबों
......त एही हाथे ना।

सोमवार, 3 मार्च 2008

ऐ कुतिया



तेरी पूंछ इत्ती-सी,
तेरी टांगें इतनी छपक-छरहरी,
तेरी भूंक मीठी-मीठी,
तेरी आंखें गुस्साई हिरनी जैसी
ऐ कुतिया!

तेरी चाल कैट वॉक की,
तेरी मस्तियां पूंजी से पुरजोर,
तेरी चौकदारी अमेरिका-जापान तक,
तेरे कान कितने चौकन्ने,
और तेरी खाल इतनी मोटी क्यों है
ऐ कुतिया!

तेरे आजू-बाजू इतनी धन-दौलत,
तेरे इतने घर-मकान,
तेरे इतने नौकर-चाकर, नाती-पनाती,
बारहो मास कोई राजधानी, कोई पहाड़ों की सैर पर,
तू शेयरों की रानी,
दलालों की दलाल और कुत्तों की कहारन
ऐ कुतिया!

तेरे नाम पर गालियों के मुहावरे हजार,
तेरे गुस्से में बर्बादियों के सात समंदरों की दहाड़,
तेरी नीद में तरह-तरह के किन्नर नरेश,
तेरी सुबहें लहलहाती हुईं,
तेरी रातें कहकहों और ठहाकों से सराबोर,
तेरी चमड़ी इत्ती सुघर-सलोनी
लेकिन तेरा मन
ऐ कुतिया!

कुतिया कहने पर गुस्सा क्यों आता है तुझे,
कुतिया का मतलब गाली क्यों होता है,
कुतिया का दूध पीने वाली औलादें
इतनी खूंख्वार क्यों होती हैं,
अब तुझसे क्या पूछें
और भी क्या-क्या कहें....
ऐ कुतिया!

(तू खुद में एक सवाल है)
(तू खुद में एक जाति है)
(तेरी जाति की हजारों-लाखों दुनिया भर में)
(ऐ कुतिया!)

(भौंकती रह, भौंकती रह)
(भौंकना ही तेरा सौंदर्यशास्त्र है)
(भौंकना तेरा पेशा है)
(भौंकने से परहेज करते ही तू मर जाएगी)
(ऐ कुतिया!)

रविवार, 2 मार्च 2008

कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....



डाल के ऊपर कउवा हौ, कउवा ऊपर कनकउवा

ओकरे उप्पर छउवा ठाकुर बइठल खायं ठोकउवा

कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....


दानापुर दरियाव किनारा, गोलघर निशानी
लाट साहेब ने किला बनाया, क्या गंगा जल पानी


जोगी जी सार रा रा.........


दिल्ली देखो ढाका देखो, शहर देखो कलकत्ता।
एक पेड़ तो ऐसा देखो, फर के ऊपर पत्ता,
जोगी जी सार रा रा............


कौन काठ के बनी खड़ौआ, कौन यार बनाया है,
कौन गुरु की सेवा कीन्हो, कौन खड़ौआ पाया,
चनन काठ के बनी खड़ौआ, बढ़यी यार बनाया हो,
हम गुरु की सेवा कीन्हा, हम खड़ौआ पाया है,
जोगी जी सारा रा रा............