शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

फागुन उड़त गुलाब

झूमर चौतार झमारी, तजो बनवारी
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी



धनि-धनि सिया रउरी भाग, राम वर पायो।
लिखि लिखि चिठिया नारद मुनि भेजे, विश्वामित्र पिठायो।
साजि बरात चले राजा दशरथ,
जनकपुरी चलि आयो, राम वर पायो।
वनविरदा से बांस मंगायो, आनन माड़ो छवायो।
कंचन कलस धरतऽ बेदिअन परऽ,
जहाँ मानिक दीप जराए, राम वर पाए।
भए व्याह देव सब हरषत, सखि सब मंगल गाए,
राजा दशरथ द्रव्य लुटाए, राम वर पाए।
धनि -धनि सिया रउरी भाग, राम वर पायो।



शुभ कातिक सिर विचारी, तजो वनवारी।
जेठ मास तन तप्त अंग भावे नहीं सारी, तजो वनवारी।
बाढ़े विरह अषाढ़ देत अद्रा झंकारी, तजो वनवारी।
सावन सेज भयावन लागतऽ,
पिरतम बिनु बुन्द कटारी, तजो वनवारी।
भादो गगन गंभीर पीर अति हृदय मंझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फंसे मुरारी, तजो वनवारी।
कातिव रास रचे मनमोहन,
द्विज पाव में पायल भारी, तजो वनवारी।
अगहन अपित अनेक विकल वृषभानु दुलारी,
पूस लगे तन जाड़ देत कुबजा को गारी।
आवत माघ बसंत जनावत, झूमर चौतार झमारी, तजो वनवारी।
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी,
नहिं भावत बिनु कंत चैत विरहा जल जारी,
दिन छुटकन वैसाख जनावत, ऐसे काम करहु विहारी, तजो वनवारी।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

अंखिया क पुतरी


अंखिया क पुतरी
करेजवा में उतरी
विदेशिया क सुघरी
सगरवा में उतरी
उतरी हो रामा
पुतरी हो रामा
रामा हो रामा....

सूने-सूने डिहवा
मड़ैया सूनी-सूनी
कबौ देहरादूनी
त कबौ टेलीफूनी
मन भइलें खूनी-खूनी
याद आवै दूनादूनी
...अंखिया क पुतरी हो रामा

छुटि गइलैं गउवां
बिलाइ गइलैं नउवां
बालेपन क दिनवा
हो गइलैं महीनवां
नाही केहू आवै ला
ना जालै केहू उहवां
...अंखिया क पुतरी हो रामा