देखबा...देखबा...तनी देखबा-देखबा, हाऊ का होत ह, अरे एतना लोग एक साथ काहें दौड़त हउवै....ऊ कइसन कइसन लोग हउवैं....ओनके का हो गइल ह....एक दमै सनक गयल हउवैं का....कुल क कुल एकै तरह क लउकत हउवैं.....नाही-नाही....ओहमै दू तरह क लोग लउकत हउवैं....आज हमहूं देखि लेहलीं ओनके....जब पढ़ली बेहया का चिट्ठा....आवा तनी मोका निकाल के दू घड़ी तुहूं पढ़ ले जा, त जानि जइबा कि असली बात का ह...ऊ लोग कउन लोग हउवैं....ओनकर कहानी भैया चिट्ठा से उधार लेइके हम इहां आप सबन के पढ़वावत हईं...जस क तस-
(यह ताजा वाकया अमीर घराने का है) सुबह-सुबह पहले तो कुछ-एक लोगों की निगाह उस पर पड़ी, फिर चारों तरफ शोर मच गया। जिसने भी उसे देखा, आंखें फटी-की-फटी रह गईं। सबकी आंखों में एक ही सवाल कि इतना सभ्य और सुदर्शऩ होते हुए भी उसने ऐसा क्यों किया? वह खुद नंगा हुआ या किन्ही बदमाशों ने उसके साथ ये हरकत की? ...और अपनी इस करतूत से अचानक वह अनगिनत महिलाओं-पुरुषों की भीड़ की आंखों में इस तरह धंस गया कि सब-के-सब बुड़बुड़ाने लगे....................यह वाकया है नये साल के दूसरे महीने की पहली तारीख यानी 1 फरवरी की सुबह का। उसे नंगा किया अमीरों की चटोरी करने वाले बुर्जुआ मीडिया ने। उसी मीडिया ने, जो कहता है देश बहुत तेजी से विकास कर रहा है। आए दिन जो देश के अमीरों की नंबरिंग की फेहरिस्त पढ़वाता रहता है। मुद्दत बाद उसने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की एक ताजा रिपोर्ट को पहले-दसरे पन्ने पर प्रमुख स्थान दिया। इस रिपोर्ट ने भारतीय लोकतंत्र को नंगा कर दिया। उन अमीर घरानों और उनके पालतू राजनेताओं के चेहरे से एक झटके में नकाब खींच थी। रिपोर्ट के आईने में सबके सब एक साथ नंगे दौड़ते दिखे। क्या है रिपोर्ट में, एक नजर आप भी जान लें-
-भारत में 17 करोड़ लोग सिर्फ 19 रुपये में रोजाना गुजारा करते हैं। उत्तर प्रदेश का पूरा ग्रामीण इलाका इसी तरह जी रहा है, जबकि बिहार में ग्रामीण सिर्फ 15रुपये में रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
- भारत में लगभग 14करोड़ लोग सिर्फ 12रुपये या इससे भी कम रुपये से रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
-पंजाब और हरियाणा सबसे खुशहाल माने जाते हैं, मीडिया भी इनकी खूब दुंदभी बजाता रहता है, लेकिन नंगी हकीकत ये है कि पंजाब में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 33रुपये और हरियाणा में 25रुपये है।
-रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय ग्रामीण एक महीने में 251रुपये से अपने को जिंदा रखता है।
-ग्रामीणों की आधी आबादी कच्चे या अधपक्के घरों में जीवन बिता रही है। इनमें कच्चे घर वाले 19फीसदी हैं।
-विकास का इतना ढिंढोरा पीटा जा रहा है लेकिन आज भी शहरी आबादी के 45फीसदी लोग ही रसोई गैस पर भोजन पका रहे हैं, जबकि गांवों में 75फीसदी लोग लकड़ी के चूल्हे से काम चला रहे हैं।........इस नंगे लोकतंत्र को देखते हुए ऐसे में कुछ सवाल--कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
-आए दिन देश के अमीरों की फेहरिस्त पढ़वा कर मीडिया आखिर क्या साबित करना चाहता है?
-एक भारतीय ढाई सौ रुपये में महीना काटता है और दूसरे (अंबानी) का व्यक्तिगत मासिक खर्च सवा दो करोड़ क्यों?
-नेता और अफसर तो हैं ही, क्या वे साहित्यकार, पत्रकार, चिंतक, वक्ता, खिलाड़ी, अभिनेता, रंगकर्मी गूंगे-बहरे या दिमागी अपाहिज नहीं हैं, जो ऐसी सच्चाइयां बयान होते ही चुप्पी साध जाते हैं?
....तो भैया
आओ भारतीय लोकतंत्र की हाट सजी है
यहां हर अंग बिकाऊ है
किडनी क्या, जो चाहो खरीद लो जाओ
पहले इनकी चुप्पियां खरीदो
फिर इनकी अक्ल खरीदो
फिर जो चाहो, सब कुछ
लोकतंत्र तो कब का नीलाम हो चुका है
तन-बदन तक नीलाम हो रहा है
अब कब जागोगे
कब तक एक दूसरे से भारतीय संस्कृति और सभ्यता का
सफेद झूठ बोलते रहोगे
यदि तुम ऐसा कर रहे हो
तो इसके सिवाय तुम्हारे पास
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
...क्योंकि तुम मर चुके हो
तुम्हारी आत्मा सड़ चुकी है!
शामिल हो जाओ नंगी दौड़ में,
शामिल तो हो ही,
फास्ट फूड खाओ
दारू पीयो, सिगरेट फूंककर काफी हाउसों में गप्प हांको,
दुनिया भर की बातें करो
और देखो कि तुम कितने नंगे हो चुके हो
....उफ्! अमीरों की खुरचन ने
तुम्हे कितना नंगा कर दिया है?
सुविधाओं ने तुम्हे कितना परजीवी बना दिया है
तो खोखले जी
तुम सिर्फ नंगे ही नहीं
इतने नकली हो गए हो तुम
कि तुम्हारी ही आंखें तुम्हे देखने से मना कर देती हैं
सोचो कि एक दिन में
कितनी बार ऐसा होता है तुम्हारे साथ,
सोचो कि तुम सब कौन हो?
आखिर क्या चाहते हो?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं दिखाई देता?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं सुनाई देता?
यदि तुम सब कुछ देख-सुन कर भी
अनजाने बने हुए हो
.....तो वाकई
तुम कितने नीच हो!!
शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008
बुधवार, 30 जनवरी 2008
आज गांन्हीबाबा का पुन्नतीथी न हउवै, त तनी ईहो सुनले जा
बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूंजीपतिया
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए
अपने महलिया में करे उजियरवा
कि बिजरी के रडवा जराए-जराए
कत्तो बने भिटवा कतहूं बने गढ़ई
कत्तो बने महल कतहुं बने मड़ई
मटिया के दियना तूहीं त बुझवाया
कि सोनवा के बेनवा डोलाए-डोलाए
मिलया में खून जरे खेत में पसीनवा
तबहुं न मिलिहैं पेट भर दनवा
अपनी गोदमिया तूहीं त भरवाया
कि बड़े-बड़े बोरवा सियाए-सिआए
राम अउर रहीम के ताके पे धइके लाला
खोई के ईमनवा बटोरे धन काला
देसवा के हमरे तू लूट के खाया
कई गुना दमवा बढ़ाए-बढ़ाए
जे त करे काम, छोट कहलावे
ऊ बा बड़ मन जे जतन बतावे
दस के सासनवा नब्बे पे करवावे
इहे परिपाटी चलाए-चलाए
जुड़ होई छतिया तनिक दऊ बरसा
अब त महलिया में खुलिहैं मदरसा
दुखिया के लरिका पढ़े बदे जइहैं
छोट-बड़ टोलिया बनाए-बनाए
बिनु काटे भिंटवा, गड़हिया न पटिहैं
अपने खुसी से धन-धरती न बटिहैं
जनता केतलवा तिजोरिया पे लगिहैं
कि महल में बजना बजाए-बजाए
.....गांन्ही जी के चेलवा लूटत बांटैं सबके
चोरवन से हथवा मिलाए-मिलाए
देसवा अमेरिका के हथवा में बन्हक
रखि देहलें नेतवा ढुकाए-ढुकाए
अब रजघटवा पै गावै लैं भजनिया
गांन्ही नाई चेहरा झुकाए-झुकाए
...रघुपति राघव राजाराम
पतना न पावैं सीताराम..सित्ताराम...सित्ताराम
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए
अपने महलिया में करे उजियरवा
कि बिजरी के रडवा जराए-जराए
कत्तो बने भिटवा कतहूं बने गढ़ई
कत्तो बने महल कतहुं बने मड़ई
मटिया के दियना तूहीं त बुझवाया
कि सोनवा के बेनवा डोलाए-डोलाए
मिलया में खून जरे खेत में पसीनवा
तबहुं न मिलिहैं पेट भर दनवा
अपनी गोदमिया तूहीं त भरवाया
कि बड़े-बड़े बोरवा सियाए-सिआए
राम अउर रहीम के ताके पे धइके लाला
खोई के ईमनवा बटोरे धन काला
देसवा के हमरे तू लूट के खाया
कई गुना दमवा बढ़ाए-बढ़ाए
जे त करे काम, छोट कहलावे
ऊ बा बड़ मन जे जतन बतावे
दस के सासनवा नब्बे पे करवावे
इहे परिपाटी चलाए-चलाए
जुड़ होई छतिया तनिक दऊ बरसा
अब त महलिया में खुलिहैं मदरसा
दुखिया के लरिका पढ़े बदे जइहैं
छोट-बड़ टोलिया बनाए-बनाए
बिनु काटे भिंटवा, गड़हिया न पटिहैं
अपने खुसी से धन-धरती न बटिहैं
जनता केतलवा तिजोरिया पे लगिहैं
कि महल में बजना बजाए-बजाए
.....गांन्ही जी के चेलवा लूटत बांटैं सबके
चोरवन से हथवा मिलाए-मिलाए
देसवा अमेरिका के हथवा में बन्हक
रखि देहलें नेतवा ढुकाए-ढुकाए
अब रजघटवा पै गावै लैं भजनिया
गांन्ही नाई चेहरा झुकाए-झुकाए
...रघुपति राघव राजाराम
पतना न पावैं सीताराम..सित्ताराम...सित्ताराम
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