गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

संसद में बहस चल रही है कि देश जल रहा है

सावधान
संसद है
बहस चल रही है
बहस चल रही है कि देश जल रहा है,
कश्मीर जल रहा है,
आसाम जल रहा है,
गुजरात जल रहा है,
पंजाब जल रहा है,
सावधान
संसद है
बहस चल रही है..............
बहस चल रही है कि टीआरपी खतरे में है
नेतागीरी बेआबरू हो रही है
दुश्मन घर में घुस के मार जा रहे हैं
और हम लाइव टेलीकास्ट में मगन है
सावधान
संसद है
बहस चल रही है
बहस चल रही है कि चुनाव आ रहा है,
कैसे कुर्सी बचाएं
कैसे एक बार फिर जनता को उल्लू बनाएं
कैसे महंगाई कुछ दिन के लिए घटाकर
वोटो की झपटमारी कर निकलें
फिर पांच साल लूटपाट की मस्तियां मनाएं
बहस चल रही है...........

मंगलवार, 23 सितंबर 2008

हे बिलाग वाले बाबू काहे एतना नाराज हउवा

न एक्को टिप्पन्नी-सिप्पनी, न कौनो ताक-झांक
आखिर एतना नाराजी क कौनो तो वजह होई
हम त रउवा लोगन के साथ कौनो एइसन गलती-सलती भी ना कइले बानीं,
हम ना जानि पावत हईं
कि बिलाग चलावै वाले बड़े-बड़े
मगजमरुअन के बीच हमारि हालत
लतमरुअन अइसन काहे होइ गइल बा।

बड़ी मेहनति से एग्गो सुत्तर हाथ में आवति दिखत ह
कि जब केहू के बिलाग पर कौनो टिप्पन्नी-सिप्पन्नी ना करति हईं
त ऊ लोग की बिरादरी से बाहर होव ही के परी।
ऊ लोग आपस में आजकल खू मुंह में मुंह सटाइ के
पच्च-पच्च पुच्ची मारत हउवैं,
लबर-लबर लिबरावत हउवैं,
केहू तुलसीदास होत जात बा
त चार लाइन पोंकि के केहू मुकितबोध के ब्रहम राछस के नाई
अपने मनवे डांस-डांस थिरकउले में मगन बा।
...त भइया ई शंकर बाबा लोगन के बरात में आपुन त तीन-तेरह क दशा होई जाई
चला भइया
कौनो बात नाहीं,
कब्बौं तक रउवा लोगन के मति-बुद्धी में हमार ढूंढि मची।
तब तक के लिए ...राम-राम, जै भोजपुरी!

सोमवार, 15 सितंबर 2008

जागो, पत्रकारों! जागो...जागते रहो

आप कहीं भी नौकरी करते हों, किसी भी अखबार में, पत्रिका में, प्रकाशन समूह में। आपके लिए यह एक बहुत ही सुनहरा अवसर हो सकता है लिखने-पढ़ने और कमाने का। एक पंथ, दो काज। एक-एक रिपोर्ट पर हजारों रुपये का पारिश्रमिक। देश का कोई हिंदी अखबार या हिंदी पत्रिका इतना भुगतान नहीं कर रही है। सुविधा यह है कि आपका नाम और पता भी गोपनीय रखा जाएगा। ऐसा कहना है आगरा से प्रकाशित वेस्ट यूपी की सबसे न्यूज मैग्जीन... जागता शहर का।

पत्रिका का पहला अंक बाजार में आ गया है। पत्रिका मूलतः स्टोरी-बेस है। उसने भंडाफोड़ पत्रकारिता के नये युग की शुरुआत की है। अपने ताजा अंक में उसने मथुरा पुलिस की लोमहर्षक बर्बरता का भंडाफोड़ किया है। कि कैसे एक दरोगा से झगड़ा करना एक फौजी को इतना भारी पड़ा कि आखिरकार उसे फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया। वही फौजी, जिसने जम्मू-कश्मीर के मोर्चे पर आतंकवादियों से मुठभेड़ में अपने 11 साथी खो दिए थे, वह घायल हो गया था और बाद में मिलिट्री ने उसे छह लाख रुपये इनाम में दिए तो उसे भी उसने अपने शहीद साथियों की विधवाओं को दे दिया।

जब धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी हिंदी पत्रिकाए काल के गाल में समा चुकी है, मौजूदा हिंदी अखबार और पत्रिकाएं अपनी-अपनी तिजोरी भरने में व्यस्त हैं, इस नयी मैग्जीन ने खास कर न्यूज रिपोर्टर्स के लिए रोजी-रोटी का नया द्वार खोल दिया है।

पत्रिका के प्रथमांक में पहला ही स्तंभ है आपबीती। इसमें पत्रिका-परिवार की ओर से सूचना प्रकाशित की गयी है कि इस कालम के अंतर्गत हर सप्ताह दो ऐसी आपबीती प्रकाशित की जाएंगी, जिनमें घटनात्मक पठनीयता का पुट हो। एक आपबीती पर
3000 रुपये, दूसरी पर 2000 रुपये पुरस्कार दिया जाएगा।

इसी तरह किसी टॉप स्टोरी के लिए रिपोर्टर को
5000 रुपये से 8000 रुपये तक पारिश्रमिक दिया जायेगा। किसी स्पेशल रिपोर्ट के लिए 3000 रुपये से 5000 रुपये तक पारिश्रमिक मिलेगा।

इस तरह कोई ईमानदार जर्नलिस्ट बिना कोई नौकरी किए जागता शहर को अपनी खोजी-सामग्री छद्म नाम से भी उपलब्ध कराकर हर माह अपनी रोजी-रोटी चला सकता है। उसे सेठों के पायताने मिर्गीछाप पत्रकारिता करने की मजबूरी न होगी।

हिंदी-पट्टी के पत्रकारों के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर हो सकता है। शर्त ये है कि स्टोरी खोज-परक, तथ्यों पर आधारित और अप्रकाशित होनी चाहिए।

तो
देर किस बात की। उठाइए कलम और हो जाइए शुरू।

जागता शहर का नारा है
जो जागे
सो आगे



स्टोरी भेजने का पता है....

जागता शहर
आफबीट मीडिया पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड
प्लॉट नंबर-24 एचआईजी
ताज नगरी, फेज-1
फतेहाबाद रोड
आगरा-6

सोमवार, 25 अगस्त 2008

जागता शहर, ऊंघता मीडिया, नई अंगड़ाई

नारा है....
जो जागे, सो आगे

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
हम करेंगे युद्ध.....

जागता शहर
नाम है उस ताजा जुनून का, जो उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान के कुल इकत्तीस जिलों में भ्रष्टाचार केखिलाफ मीडिया-हुंकार भरने जा रहा है।
जागता शहर नाम है उस साप्ताहिक न्यूज मैग्जीन का, जिसके भीतर छिपी आग की लपटें अभी से सुदूर तक नएतरह के जन-कोलाहल का संकेत देने लगी हैं।
जागता शहर हिंदी समाचार साप्ताहिक के संपादक है अनिल शुक्ला, जिनकी खोजी रपटों ने किसी जमाने में रविवार के पन्नों से ठहरे वक्त को ललकारा था।
वह जमाना था जाने-माने पत्रकार और रविवार के संपादक एसपी सिंह का, जिन्होंने राजेंद्र माथुर के बाद हिंदी पत्रकारिता को नयी दशा-दिशा का एहसास कराया था।
अमर उजाला आगरा से कुछ ही समय बाद मुंह मोड़ कर अनिल शुक्ला एसपी सिंह की टीम में शामिल हो गए थे, फिर संडे मेल, दूरदर्शन आदि में कुछ समय रहे।
अनिल शुक्ला, जिन्होंने यह कहते हुए संडे मेल से त्यागपत्र दे दिया था कि मैं मूर्ख संपादकों को झेलते-झेलते आजिज आ गया हूं, उनकी चाकरी नहीं करूंगा।
जागता शहर के संपादक अनिल शुक्ला ने रविवार के लखनऊ, जयपुर ब्यूरो प्रमुख का दायित्व संभालने के दौरान ही लिया था रिजनल न्यूज मैग्जीन का संकल्प।
रीजन फोकस न्यूज मैग्जीन, सप्ताह में एक बार, महीने में चार बार उत्तर प्रदेश के नौ मंडलों, राजस्थान के चार जिलों और मध्य प्रदेश के तीन जिलों में पहुंचेगी।
उत्तर प्रदेश में जागता शहर का पाठक वर्ग होगा वेस्ट यूपी के 26 जिलों में...आगरा, मथुरा, फीरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद, एटा, कांसीराम नगर, हाथरस, अलीगढ़, बुलंदशहर, गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मुरादाबाद-बरेली मंडल।
राजस्थान में जागता शहर के पाठक होंगे धौलपुर, बयाना, भरतपुर, बाड़ी के लोग और मध्य प्रदेश में ग्वालियर, भिंड, मुरैना आदि के पाठक इसे पढ़ सकेंगे।
जागता शहर सिर्फ साप्ताहिक न्यूज मैग्जीन नहीं, संपादक अनिल शुक्ला के जीवन का वह आखिरी मोर्चा है, जिसका नारा है, भ्रष्टाचार के विरुद्ध हम करेंगे युद्ध।
जागता शहर में होंगी ऐसी स्टोरी, जो उसके पाठक वर्ग ने कभी किसी अखबार या चैनल पर देखी-सुनी नहीं होगी, साथ में यूथ, महिलाओं और खेल के पन्ने भी।
जागता शहर का नारा है..जो जागे सो आगे। उसकी खोजी रपटें उन लोगों को झकझोरेंगी, जगाएंगी जो व्यवस्था की मार से थकने और ऊंघने लगे हैं।
जागता शहर में हर हफ्ते खुलेगी उनकी पोल, जो अजगर की तरह अपने आसपास को लपेटे हुए हैं। अजगर अफसर, मंत्री, नेता, अपराधी।
जागता शहर यानी जनतंत्र का प्रहरी, ढुलमुलाते लोकतंत्र की आवाज, भ्रष्ट नौकरशाहों और राजनेताओं का दुश्मन और आम आदमी की जुबान।
जागता शहर अपने जन्म से पहले ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नए मीडिया-परिदृश्य की तरह सुलगने लगा है। उसकी चिंगारियां अटकलों में गूंजने लगी हैं।
जागता शहर के संपादक अनिल शुक्ला की संपादकीय टीम में हैं ऐसे पत्रकार, जिन्हें सेठों और उनके पायताने बैठे समर्पणकारियों की चाटुकारिता रास न आयी।
उन पत्रकारों की टीम, जिन्होने जीवन भर देश के चार बड़े हिंदी अखबारों के भीतर समय गुजारते हुए भी अपनी सोच और शब्द-संपदा को सुरक्षित रखा।
वे पत्रकार, जिन्होंने बड़े-से-बैनर को बात-बात पर ठोकरें मारीं, कभी उनकी झांसा-पट्टियों में नहीं आए। वे जहां भी रहे, पेशे की लड़ाई लड़ते रहे।
...तो ऐसा है जागता शहर परिवार। पत्रकारिता में नयी संभावनाओं का वारिस। पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूरे प्रदेश और फिर चार राजधानियों तक होगा उसका सफर।
इसी संकल्प के साथ वेस्ट यूपी में नयी कोलाहल पैदा करने जा रहा है जागता शहर। अपने करोड़ों पाठकों की उम्मीदों की सुबह लिये आ रहा है वह शीघ्र सितंबर में.....

सोमवार, 19 मई 2008

मेरे जैसे जाने कितने हैं इस हिंदुस्तान में



कवि कैलाश गौतम

तेज धूप में
तेज धूप में
नंगे पांव वह भी रेगिस्तान में,
मेरे जैसे जाने कितने
हैं इस हिन्दुस्तान में।
जोता-बोया-सींचा-पाला
बड़े जतन से देखा भाला
कटी फसल तो
साथ महाजन भी उतरे खलिहान में।
जाने क्या-क्या टूटा-फूटा हँसी न छूटी गीत न छूटा
सदा रहा
तिरसठ का नाता बिरहा और मचान में।
जीना भी है मरना भी है
मुझको पार उतरना भी है
यही सोचता रहा
बराबर बैठा कन्यादान में।

उतरे नहीं ताल पर पंछी

उतरे नहीं ताल पर पंछी
बादल नहीं घिरे
हम बंजारे
मारे-मारे दिन भर आज फिरे।
गीत न फूटा
हँसी न लौटी सब कुछ मौन रहा,
पगडन्डी पर आगे-आगे
जाने कौन रहा
हवा न डोली
छाँह न बोली ऐसे मोड़ मिले।
आर-पार का न्योता देकर
मौसम चला गया
हिरन अभागा उसी रेत में
फिर-फिर छला गया
प्यासे ही रह गये
हमारे पाटल नहीं खिले।
मन दो टूक हुआ है सपने चकनाचूर हुए
जितनी दूर नहीं सोचे थे
उतनी दूर हुए
रात गये
आँगन में सौ-सौ तारे टूट गिरे।

बारिश में घर लौटा कोई

बारिश में घर लौटा कोई

दर्पण देख रहा
न्यूटन
जैसे पृथ्वी का
आकर्षण
देख रहा।

धान-पान सी आदमकद
हरियाली लिपटी है,
हाथों में हल्दी पैरों में
लाली लिपटी है
भीतर ही भीतर कितना

परिवर्तन देख रहा।

गीत-हँसी-संकोच-शील सब
मिले विरासत में
जो कुछ है इस घर में सब कुछ प्रस्तुत स्वागत में
कितना मीठा है मौसम का

बंधन देख रहा।

नाच रही है दिन की छुवन
अभी भी आँखों में,
फूलझरी सी छूट रही है
वही पटाखों में
लगता जैसे मुड़-मुड़ कोई

हर क्षण देख रहा।

दिन भर चाह रही होठों पर,
दिन भर प्यास रही
रेशम जैसी धूप रही
मखमल सी घास रही
आँख मूँदकर
सुख सर्वस्व समर्पण देख रहा।

बीते दिन

बीते दिन
मैं भूल नहीं पाता,
था कोई जो
मुझे देखकर मई जून की तेज धूप में
मेरे आगे हो जाता था

बादल पेड़ खुला छाता।

मन से जुड़ता
चुटकी लेता ताने कसता था,
खिल उठता था ताल
चाँद पानी में हँसता था
मैं उसकी आँखों में सोता
वह मेरी साँसों में गाता।
कैसे-कैसे शहर और
कैसी यात्रायें हैं,
तेज धार में हाथ थामकर
साथ नहाये हैं
कितना सहज समर्पण था वह
कैसा था
स्वाभाविक नाता
कैसी-कैसी सीमायें थीं
कैसे घेरे थे,
शामें थीं रसवंत और जीवंत सबेरे थे
तन जैसे लहराता रहता
रस जैसे मौसम बरसाता।

छुट्टियाँ होती हैं लेकिन

छुट्टियाँ होती हैं लेकिन
क्या बतायें छुट्टियों में
हम
अब नहीं घर से निकलते रंग लेकर राग लेकर
एक आदिम आग लेकर
मुट्ठियों में हम।
धूप-झरना, फूल-पत्ते
गुनगुनाती घाटियाँ
ले गईं सब कुछ उड़ाकर
सभ्यता की आंधियाँ
घर गृहस्थी दोस्त दफ्तर
बोझ सब लगते
समय पर
जी रहे बस औपचारिक चिट्ठियों में हम।
कल्पनायें प्रेम की
संवेदनायें प्रेम की
विज्ञापनों में आ गईं
सारी ऋचायें प्रेम की
थे गीत-वंशी कहकहे
क्या-क्या नहीं भोगे सहे
ईंधन हुये
कैसा समय की भट्ठियों में हम।

बरसों बाद मिला है कोई

बरसों बाद मिला है कोई

कहाँ छिपाऊँ मैं,

केवल उसे निहारूँ
या
फिर-फिर बतियाऊँ मैं।
तनिक न बदला वही हू बहू
पहले जैसा है
बतियाने का लहजा भी
जैसा का तैसा है
सोच रहा
हँसते चहरे को और हँसाऊँ मैं।
थोड़ी सी कुछ टूटन जैसी
मन में झलक रही
बरसी नहीं घटा कजरारी
क्यारी नहीं बही
असमंजस में
घिरा हुआ हूँ क्या बतलाऊँ मैं।
बीते दिन भी इस मौके पर
ऐसे घेरे रहे,
फेर रहे हैं हाथ प्राण पर
मन से टेर रहे,
क्या-क्या फूँकूँ
एक सांस में क्या-क्या गाऊँ मैं।

रविवार, 11 मई 2008

खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में

एही कहल जाला आंख एक्को ना, कजरौटा बारह ठो। आ तनी आउर मुंहफटई से कहीं त झोरी में बाल नहीं (बाल ऊ वाला), औ चले जगन्नाथ जी। सरमायेदारन की सेवकाई में कटोरा लेइके दर-दर डोलत ई मुड़कटवन के का कहलि जाइ कि फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै। त भइया चरनबंदन चहुंओंरी....एही चारन गान पर नीचे कुछ लाइना इहां सुनावति बानी रउवा सबन के..... समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी। हाथी से आयी घोड़ा से आयी अंगरेजी बाजा बजाई...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। नोटवा से आयी वोटवा से आयी बिड़ला के घर में समायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। गांधी से आयी आंधी से आयी टुटही मड़इया उड़ायी,...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। कांगरेस से आयी जनता से आयी झंडा के बदली हो जायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। डालर से आयी रूबल से आयी देसवा के बान्हे धरायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। वादा से आयी लबादा से आयी जनता के कुरसी बनायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। लाठी से आयी गोली से आयी लेकिन अहिंसा कहायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। महंगी ले आयी गरीबी ले आयी केतनो मजूरा कमायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। छोटका के छोटहन बड़का के बड़हन बखरा बराबर लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। परसों ले आयी बरसों ले आयी हरदम अकासे तकायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। धीरे-धीरे आयी चुपे-चुपे आयी अंखियन पर परदा लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

त भइया, गोरख पांड़े त ई कुल गावत-गावत मरि गइलैं। उनहूं के भला का मालूम रहल कि समजावाद का कमाई-धमाई खाए-खसौटे वाले दलाल टाटा की थैली में मुंह मारि-मारि के सिंदूरग्राम अउर नांदीग्राम में अपने मुंहे करिखा लगाइके थेथर की तरह घूमत बानै आजकल। आ ऊ जमाने के, पांड़े जी के जमाने के बड़े-बड़े करांतिकारी लोग दिल्ली में सहाराश्री-सहाराश्री जपत हउवैं। केहू पतरकार बनत डोलत बा, जोतीबसू का जीवनी लिखत बा त केहू एहर-ओहर पूंजी के दलालन के नाबदान में थूथुन चभोरत बा। आ जे लोग नक्सलबाड़ी में बान-धनुख तनले रहे, उनहू लोगन में केहू मीरघाट-केहू तीरघाट पर आपनि-आपनि मंडली लेके बड़ा जोरदार बहस में जुटल बा साठ साल से कि हमार असली दुसमन के हउवै। एतना साल में त आदमी चाहै त पताल खोदि नावै। धिक्कार बा उनहू लोगन के अइसन जनखा गोलइती प। सुनै में आवत ह कि ऊहो लोगन में केहू क सरदार लेबी के पइसा से अमरीकी शर्ट-बुश्शर्ट पहिनी के अरिमल-परिमल परकासन चलावत बा अपने मेहरी-लइका, साढ़ू-सढ़ुआइन के साथ त केहू तराई में टांगि भचकावत रागमल्हार में डूबलि बा। आज ले केहू से एक तिनको भर नाही उखरल। उनही लोगन में केहू अमेरिका से लौटि के बीबी के पल्लू में एनजीओगीरी करत बा त केहू बिहार अउर आन्हर परदेस के जंगलन में फालूत के धांय-धांय में आपनि ताकत झोंकले बा। अरे बेसरम, तू लोगन के चिल्लू भर पानी में डूबि मरै के चाही कि देखा नैपाल में बिना कौनो डरामा-नौटंकी कैसे बहादुरन की जमाति ने ऊ रजवा के खदेड़ि देहलस...आ तू लोगन अजादी क मशालै पढ़ावति रहि गइला। कहां गइल तोहार आइसा-फाइसा. आइपीएफ-साइपीएफ.... आखिर कब ले तोहन लोगन ढुकारि मारि के दिल्ली के कोने अतरे में फोकट का बुद्धी बघारत रहबा। तोहन लोगन त आपसै में कटि मरबा, जनता के खातिर का कइबा कट्टू? देखा कठपुतली नीयर मनमोहना कैसे चीन अमरीका धांगत हउवै, मर्द त ऊ हउवै, तोहन लोग सारी पहिनि के घूमा ससुरो। किसान मजूर क कलेजा जरी त ओकरे मुंह से ईहै कुल गारी-गुपुत निकली। मरला की हद कइ नउला तोहन लोग। खैर कौनो बात नइखैं। हमरे बस में आजि एतने हउवै कि एही तरहि से तोहन लोगन क खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में। तू लोग नगरी-नगरी द्वारे वैन प लादि के किताब कापी बेचा, क्रांति-स्रांती का नाटक-नौटकी करा, गीत-गाना का सीडी-वोडी बेचा-बिकना, आपन रोजी-रोटी चलावा, बस तोहरे लोगन से आउर कुछ उखरै-परिआए क भरोसै बेकार बा। अकारथ गइलि कुल कुरबानी। जाने केतनी सहीद लोग अपने-अपने कबर में से तोहन लोगन क ई रामलीला देखति होइहैं, जनता त देखती बाय। ई बाति तोहनो लोगन पर लागू हउवै कि... फुहरी गईल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी लगल गावै।

शुक्रवार, 7 मार्च 2008

रउरे बुढि़या के गलवा में क्रीम लागेला, हमरी नइकी के जरि गइलें भाग भाई जी

आज महिला दिवस ह। ईहो एकठो चोचलेबाजी बा। कौनो मुंह बनउले क जरूरत नइखैं। दुनिया भर में दुनिया भर क दिवस मनावै क फैशन स चल गइलि बा। ओही में एक फैशन ईहो हउवै। सरऊ लोग तरह-तरह क तमाशा करत हउवैं। चिढ़ावै के खातिन। कबौं लइकन के चिढ़इहैं, त कबौं बुढ़वन के, कबौं मजदूरन के चिढ़इहैं त कबौं किसानन के... भोजपुरी में एकगो कहावत ह कि ओढ़ौ के दुका नहीं, दरी बिछनौना। दुनिया भर क के गिनावै. अपने आसैपास देखिला, आसैपास का- तनी अपने घरहि में देखिला कि कइसन हाल बा महिला लोगन का। केहू जनमते बेंचि देत ह, केहू गरभ में ही मरवाइ देत ह, त केहू जिनगी भर मारि-मारि के कचूमर निकालि लेत ह।
त भइया ई कुल झांसा-पट्टी क खेल ह। जौन करै के चाही, तौन त केहू कुछ करत-धरत ना ह, महिला दिवस जरूर मनइहैं। अमीरी-गरीबी का खोदि-खोदि के समुंदर बनावत जात हउवैं, पइसा वालन के मेम इसनो-पाउडर चेंपि के रोज-रोज हाट-बाट, माल, मारकेट क धौरहरि मचउले हईं, गरीबन क बिटिया-मेहरारू गिट्टी तोड़त हईं, घास करति हईं, हर जोतत हईं, पत्ता-पन्नी बीनति हईं, त पेट-परदा चलत ह।
केतना महिला संगठन हउवैं, हर पार्टी में महिला विंग अलग से, केतना पंच-परधान मेहरारू हईं, अउर-त-अउर सोनिया गान्ही, मायावती बहिन जइसन दुनिया भर क चौधरानी अपने देश-मुलुक में गद्दी पर बइठि के खूब मजा काटति बानी, आ औरतन क हाल जस क तस बा। वोट लेवै के बेला में ई कुल औरति बनि जालीं, एकरे बाद पांच साल तक के पूछत बा, केहू नइखैं। अब त भइया ई कुल चिरकुटाई सुनत-सुनत जी पकि गइल बा। ई कुल महोखाबाजी अब तनिको बरदास्त ना होत बा। ऊ कुल आपन-आपन चमकीला खतोना बनाइ-बनाइ के हम लोगन के खूब भरमावत हउवैं। छोड़ा जाएदा उनहन क महिला-सहिला दिवस का बात-कुबात...... आवा तनी एही बहाने गीत-गवनई होइ जाय गोरख पांड़े के मुंह-राग से, उनहीं के सबदन में.....

पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइलें त बोले लगलें ना
तोहके खेतवा दिअइबों
तोहके फसलि उगइबो
दूसरे चुनउवा में जब उपरइलें त बोलें लगलें ना
तोहके कुइयां खनइबो
सब पियसिया मिटइबौ
तीसरे चुनउवा में चेहरा दिखइलें त बोले लगलें ना
तोहके महल उठइबों
ओमे बिजुरी लगइबों
अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तू बहुत कइला ना
तोहके अब न थकइबो
आपन हथवा उठइबो
जब हम ईहवों के किलवा ढहइबो त एही हाथे ना
तोहरो मटिया मिलइबो
आपन रजवा बनइबों
......त एही हाथे ना।