गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

संसद में बहस चल रही है कि देश जल रहा है

सावधान
संसद है
बहस चल रही है
बहस चल रही है कि देश जल रहा है,
कश्मीर जल रहा है,
आसाम जल रहा है,
गुजरात जल रहा है,
पंजाब जल रहा है,
सावधान
संसद है
बहस चल रही है..............
बहस चल रही है कि टीआरपी खतरे में है
नेतागीरी बेआबरू हो रही है
दुश्मन घर में घुस के मार जा रहे हैं
और हम लाइव टेलीकास्ट में मगन है
सावधान
संसद है
बहस चल रही है
बहस चल रही है कि चुनाव आ रहा है,
कैसे कुर्सी बचाएं
कैसे एक बार फिर जनता को उल्लू बनाएं
कैसे महंगाई कुछ दिन के लिए घटाकर
वोटो की झपटमारी कर निकलें
फिर पांच साल लूटपाट की मस्तियां मनाएं
बहस चल रही है...........

मंगलवार, 23 सितंबर 2008

हे बिलाग वाले बाबू काहे एतना नाराज हउवा

न एक्को टिप्पन्नी-सिप्पनी, न कौनो ताक-झांक
आखिर एतना नाराजी क कौनो तो वजह होई
हम त रउवा लोगन के साथ कौनो एइसन गलती-सलती भी ना कइले बानीं,
हम ना जानि पावत हईं
कि बिलाग चलावै वाले बड़े-बड़े
मगजमरुअन के बीच हमारि हालत
लतमरुअन अइसन काहे होइ गइल बा।

बड़ी मेहनति से एग्गो सुत्तर हाथ में आवति दिखत ह
कि जब केहू के बिलाग पर कौनो टिप्पन्नी-सिप्पन्नी ना करति हईं
त ऊ लोग की बिरादरी से बाहर होव ही के परी।
ऊ लोग आपस में आजकल खू मुंह में मुंह सटाइ के
पच्च-पच्च पुच्ची मारत हउवैं,
लबर-लबर लिबरावत हउवैं,
केहू तुलसीदास होत जात बा
त चार लाइन पोंकि के केहू मुकितबोध के ब्रहम राछस के नाई
अपने मनवे डांस-डांस थिरकउले में मगन बा।
...त भइया ई शंकर बाबा लोगन के बरात में आपुन त तीन-तेरह क दशा होई जाई
चला भइया
कौनो बात नाहीं,
कब्बौं तक रउवा लोगन के मति-बुद्धी में हमार ढूंढि मची।
तब तक के लिए ...राम-राम, जै भोजपुरी!

सोमवार, 15 सितंबर 2008

जागो, पत्रकारों! जागो...जागते रहो

आप कहीं भी नौकरी करते हों, किसी भी अखबार में, पत्रिका में, प्रकाशन समूह में। आपके लिए यह एक बहुत ही सुनहरा अवसर हो सकता है लिखने-पढ़ने और कमाने का। एक पंथ, दो काज। एक-एक रिपोर्ट पर हजारों रुपये का पारिश्रमिक। देश का कोई हिंदी अखबार या हिंदी पत्रिका इतना भुगतान नहीं कर रही है। सुविधा यह है कि आपका नाम और पता भी गोपनीय रखा जाएगा। ऐसा कहना है आगरा से प्रकाशित वेस्ट यूपी की सबसे न्यूज मैग्जीन... जागता शहर का।

पत्रिका का पहला अंक बाजार में आ गया है। पत्रिका मूलतः स्टोरी-बेस है। उसने भंडाफोड़ पत्रकारिता के नये युग की शुरुआत की है। अपने ताजा अंक में उसने मथुरा पुलिस की लोमहर्षक बर्बरता का भंडाफोड़ किया है। कि कैसे एक दरोगा से झगड़ा करना एक फौजी को इतना भारी पड़ा कि आखिरकार उसे फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया। वही फौजी, जिसने जम्मू-कश्मीर के मोर्चे पर आतंकवादियों से मुठभेड़ में अपने 11 साथी खो दिए थे, वह घायल हो गया था और बाद में मिलिट्री ने उसे छह लाख रुपये इनाम में दिए तो उसे भी उसने अपने शहीद साथियों की विधवाओं को दे दिया।

जब धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी हिंदी पत्रिकाए काल के गाल में समा चुकी है, मौजूदा हिंदी अखबार और पत्रिकाएं अपनी-अपनी तिजोरी भरने में व्यस्त हैं, इस नयी मैग्जीन ने खास कर न्यूज रिपोर्टर्स के लिए रोजी-रोटी का नया द्वार खोल दिया है।

पत्रिका के प्रथमांक में पहला ही स्तंभ है आपबीती। इसमें पत्रिका-परिवार की ओर से सूचना प्रकाशित की गयी है कि इस कालम के अंतर्गत हर सप्ताह दो ऐसी आपबीती प्रकाशित की जाएंगी, जिनमें घटनात्मक पठनीयता का पुट हो। एक आपबीती पर
3000 रुपये, दूसरी पर 2000 रुपये पुरस्कार दिया जाएगा।

इसी तरह किसी टॉप स्टोरी के लिए रिपोर्टर को
5000 रुपये से 8000 रुपये तक पारिश्रमिक दिया जायेगा। किसी स्पेशल रिपोर्ट के लिए 3000 रुपये से 5000 रुपये तक पारिश्रमिक मिलेगा।

इस तरह कोई ईमानदार जर्नलिस्ट बिना कोई नौकरी किए जागता शहर को अपनी खोजी-सामग्री छद्म नाम से भी उपलब्ध कराकर हर माह अपनी रोजी-रोटी चला सकता है। उसे सेठों के पायताने मिर्गीछाप पत्रकारिता करने की मजबूरी न होगी।

हिंदी-पट्टी के पत्रकारों के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर हो सकता है। शर्त ये है कि स्टोरी खोज-परक, तथ्यों पर आधारित और अप्रकाशित होनी चाहिए।

तो
देर किस बात की। उठाइए कलम और हो जाइए शुरू।

जागता शहर का नारा है
जो जागे
सो आगे



स्टोरी भेजने का पता है....

जागता शहर
आफबीट मीडिया पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड
प्लॉट नंबर-24 एचआईजी
ताज नगरी, फेज-1
फतेहाबाद रोड
आगरा-6

सोमवार, 25 अगस्त 2008

जागता शहर, ऊंघता मीडिया, नई अंगड़ाई

नारा है....
जो जागे, सो आगे

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
हम करेंगे युद्ध.....

जागता शहर
नाम है उस ताजा जुनून का, जो उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान के कुल इकत्तीस जिलों में भ्रष्टाचार केखिलाफ मीडिया-हुंकार भरने जा रहा है।
जागता शहर नाम है उस साप्ताहिक न्यूज मैग्जीन का, जिसके भीतर छिपी आग की लपटें अभी से सुदूर तक नएतरह के जन-कोलाहल का संकेत देने लगी हैं।
जागता शहर हिंदी समाचार साप्ताहिक के संपादक है अनिल शुक्ला, जिनकी खोजी रपटों ने किसी जमाने में रविवार के पन्नों से ठहरे वक्त को ललकारा था।
वह जमाना था जाने-माने पत्रकार और रविवार के संपादक एसपी सिंह का, जिन्होंने राजेंद्र माथुर के बाद हिंदी पत्रकारिता को नयी दशा-दिशा का एहसास कराया था।
अमर उजाला आगरा से कुछ ही समय बाद मुंह मोड़ कर अनिल शुक्ला एसपी सिंह की टीम में शामिल हो गए थे, फिर संडे मेल, दूरदर्शन आदि में कुछ समय रहे।
अनिल शुक्ला, जिन्होंने यह कहते हुए संडे मेल से त्यागपत्र दे दिया था कि मैं मूर्ख संपादकों को झेलते-झेलते आजिज आ गया हूं, उनकी चाकरी नहीं करूंगा।
जागता शहर के संपादक अनिल शुक्ला ने रविवार के लखनऊ, जयपुर ब्यूरो प्रमुख का दायित्व संभालने के दौरान ही लिया था रिजनल न्यूज मैग्जीन का संकल्प।
रीजन फोकस न्यूज मैग्जीन, सप्ताह में एक बार, महीने में चार बार उत्तर प्रदेश के नौ मंडलों, राजस्थान के चार जिलों और मध्य प्रदेश के तीन जिलों में पहुंचेगी।
उत्तर प्रदेश में जागता शहर का पाठक वर्ग होगा वेस्ट यूपी के 26 जिलों में...आगरा, मथुरा, फीरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद, एटा, कांसीराम नगर, हाथरस, अलीगढ़, बुलंदशहर, गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मुरादाबाद-बरेली मंडल।
राजस्थान में जागता शहर के पाठक होंगे धौलपुर, बयाना, भरतपुर, बाड़ी के लोग और मध्य प्रदेश में ग्वालियर, भिंड, मुरैना आदि के पाठक इसे पढ़ सकेंगे।
जागता शहर सिर्फ साप्ताहिक न्यूज मैग्जीन नहीं, संपादक अनिल शुक्ला के जीवन का वह आखिरी मोर्चा है, जिसका नारा है, भ्रष्टाचार के विरुद्ध हम करेंगे युद्ध।
जागता शहर में होंगी ऐसी स्टोरी, जो उसके पाठक वर्ग ने कभी किसी अखबार या चैनल पर देखी-सुनी नहीं होगी, साथ में यूथ, महिलाओं और खेल के पन्ने भी।
जागता शहर का नारा है..जो जागे सो आगे। उसकी खोजी रपटें उन लोगों को झकझोरेंगी, जगाएंगी जो व्यवस्था की मार से थकने और ऊंघने लगे हैं।
जागता शहर में हर हफ्ते खुलेगी उनकी पोल, जो अजगर की तरह अपने आसपास को लपेटे हुए हैं। अजगर अफसर, मंत्री, नेता, अपराधी।
जागता शहर यानी जनतंत्र का प्रहरी, ढुलमुलाते लोकतंत्र की आवाज, भ्रष्ट नौकरशाहों और राजनेताओं का दुश्मन और आम आदमी की जुबान।
जागता शहर अपने जन्म से पहले ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नए मीडिया-परिदृश्य की तरह सुलगने लगा है। उसकी चिंगारियां अटकलों में गूंजने लगी हैं।
जागता शहर के संपादक अनिल शुक्ला की संपादकीय टीम में हैं ऐसे पत्रकार, जिन्हें सेठों और उनके पायताने बैठे समर्पणकारियों की चाटुकारिता रास न आयी।
उन पत्रकारों की टीम, जिन्होने जीवन भर देश के चार बड़े हिंदी अखबारों के भीतर समय गुजारते हुए भी अपनी सोच और शब्द-संपदा को सुरक्षित रखा।
वे पत्रकार, जिन्होंने बड़े-से-बैनर को बात-बात पर ठोकरें मारीं, कभी उनकी झांसा-पट्टियों में नहीं आए। वे जहां भी रहे, पेशे की लड़ाई लड़ते रहे।
...तो ऐसा है जागता शहर परिवार। पत्रकारिता में नयी संभावनाओं का वारिस। पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूरे प्रदेश और फिर चार राजधानियों तक होगा उसका सफर।
इसी संकल्प के साथ वेस्ट यूपी में नयी कोलाहल पैदा करने जा रहा है जागता शहर। अपने करोड़ों पाठकों की उम्मीदों की सुबह लिये आ रहा है वह शीघ्र सितंबर में.....

सोमवार, 19 मई 2008

मेरे जैसे जाने कितने हैं इस हिंदुस्तान में



कवि कैलाश गौतम

तेज धूप में
तेज धूप में
नंगे पांव वह भी रेगिस्तान में,
मेरे जैसे जाने कितने
हैं इस हिन्दुस्तान में।
जोता-बोया-सींचा-पाला
बड़े जतन से देखा भाला
कटी फसल तो
साथ महाजन भी उतरे खलिहान में।
जाने क्या-क्या टूटा-फूटा हँसी न छूटी गीत न छूटा
सदा रहा
तिरसठ का नाता बिरहा और मचान में।
जीना भी है मरना भी है
मुझको पार उतरना भी है
यही सोचता रहा
बराबर बैठा कन्यादान में।

उतरे नहीं ताल पर पंछी

उतरे नहीं ताल पर पंछी
बादल नहीं घिरे
हम बंजारे
मारे-मारे दिन भर आज फिरे।
गीत न फूटा
हँसी न लौटी सब कुछ मौन रहा,
पगडन्डी पर आगे-आगे
जाने कौन रहा
हवा न डोली
छाँह न बोली ऐसे मोड़ मिले।
आर-पार का न्योता देकर
मौसम चला गया
हिरन अभागा उसी रेत में
फिर-फिर छला गया
प्यासे ही रह गये
हमारे पाटल नहीं खिले।
मन दो टूक हुआ है सपने चकनाचूर हुए
जितनी दूर नहीं सोचे थे
उतनी दूर हुए
रात गये
आँगन में सौ-सौ तारे टूट गिरे।

बारिश में घर लौटा कोई

बारिश में घर लौटा कोई

दर्पण देख रहा
न्यूटन
जैसे पृथ्वी का
आकर्षण
देख रहा।

धान-पान सी आदमकद
हरियाली लिपटी है,
हाथों में हल्दी पैरों में
लाली लिपटी है
भीतर ही भीतर कितना

परिवर्तन देख रहा।

गीत-हँसी-संकोच-शील सब
मिले विरासत में
जो कुछ है इस घर में सब कुछ प्रस्तुत स्वागत में
कितना मीठा है मौसम का

बंधन देख रहा।

नाच रही है दिन की छुवन
अभी भी आँखों में,
फूलझरी सी छूट रही है
वही पटाखों में
लगता जैसे मुड़-मुड़ कोई

हर क्षण देख रहा।

दिन भर चाह रही होठों पर,
दिन भर प्यास रही
रेशम जैसी धूप रही
मखमल सी घास रही
आँख मूँदकर
सुख सर्वस्व समर्पण देख रहा।

बीते दिन

बीते दिन
मैं भूल नहीं पाता,
था कोई जो
मुझे देखकर मई जून की तेज धूप में
मेरे आगे हो जाता था

बादल पेड़ खुला छाता।

मन से जुड़ता
चुटकी लेता ताने कसता था,
खिल उठता था ताल
चाँद पानी में हँसता था
मैं उसकी आँखों में सोता
वह मेरी साँसों में गाता।
कैसे-कैसे शहर और
कैसी यात्रायें हैं,
तेज धार में हाथ थामकर
साथ नहाये हैं
कितना सहज समर्पण था वह
कैसा था
स्वाभाविक नाता
कैसी-कैसी सीमायें थीं
कैसे घेरे थे,
शामें थीं रसवंत और जीवंत सबेरे थे
तन जैसे लहराता रहता
रस जैसे मौसम बरसाता।

छुट्टियाँ होती हैं लेकिन

छुट्टियाँ होती हैं लेकिन
क्या बतायें छुट्टियों में
हम
अब नहीं घर से निकलते रंग लेकर राग लेकर
एक आदिम आग लेकर
मुट्ठियों में हम।
धूप-झरना, फूल-पत्ते
गुनगुनाती घाटियाँ
ले गईं सब कुछ उड़ाकर
सभ्यता की आंधियाँ
घर गृहस्थी दोस्त दफ्तर
बोझ सब लगते
समय पर
जी रहे बस औपचारिक चिट्ठियों में हम।
कल्पनायें प्रेम की
संवेदनायें प्रेम की
विज्ञापनों में आ गईं
सारी ऋचायें प्रेम की
थे गीत-वंशी कहकहे
क्या-क्या नहीं भोगे सहे
ईंधन हुये
कैसा समय की भट्ठियों में हम।

बरसों बाद मिला है कोई

बरसों बाद मिला है कोई

कहाँ छिपाऊँ मैं,

केवल उसे निहारूँ
या
फिर-फिर बतियाऊँ मैं।
तनिक न बदला वही हू बहू
पहले जैसा है
बतियाने का लहजा भी
जैसा का तैसा है
सोच रहा
हँसते चहरे को और हँसाऊँ मैं।
थोड़ी सी कुछ टूटन जैसी
मन में झलक रही
बरसी नहीं घटा कजरारी
क्यारी नहीं बही
असमंजस में
घिरा हुआ हूँ क्या बतलाऊँ मैं।
बीते दिन भी इस मौके पर
ऐसे घेरे रहे,
फेर रहे हैं हाथ प्राण पर
मन से टेर रहे,
क्या-क्या फूँकूँ
एक सांस में क्या-क्या गाऊँ मैं।

रविवार, 11 मई 2008

खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में

एही कहल जाला आंख एक्को ना, कजरौटा बारह ठो। आ तनी आउर मुंहफटई से कहीं त झोरी में बाल नहीं (बाल ऊ वाला), औ चले जगन्नाथ जी। सरमायेदारन की सेवकाई में कटोरा लेइके दर-दर डोलत ई मुड़कटवन के का कहलि जाइ कि फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै। त भइया चरनबंदन चहुंओंरी....एही चारन गान पर नीचे कुछ लाइना इहां सुनावति बानी रउवा सबन के..... समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी। हाथी से आयी घोड़ा से आयी अंगरेजी बाजा बजाई...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। नोटवा से आयी वोटवा से आयी बिड़ला के घर में समायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। गांधी से आयी आंधी से आयी टुटही मड़इया उड़ायी,...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। कांगरेस से आयी जनता से आयी झंडा के बदली हो जायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। डालर से आयी रूबल से आयी देसवा के बान्हे धरायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। वादा से आयी लबादा से आयी जनता के कुरसी बनायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। लाठी से आयी गोली से आयी लेकिन अहिंसा कहायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। महंगी ले आयी गरीबी ले आयी केतनो मजूरा कमायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। छोटका के छोटहन बड़का के बड़हन बखरा बराबर लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। परसों ले आयी बरसों ले आयी हरदम अकासे तकायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। धीरे-धीरे आयी चुपे-चुपे आयी अंखियन पर परदा लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

त भइया, गोरख पांड़े त ई कुल गावत-गावत मरि गइलैं। उनहूं के भला का मालूम रहल कि समजावाद का कमाई-धमाई खाए-खसौटे वाले दलाल टाटा की थैली में मुंह मारि-मारि के सिंदूरग्राम अउर नांदीग्राम में अपने मुंहे करिखा लगाइके थेथर की तरह घूमत बानै आजकल। आ ऊ जमाने के, पांड़े जी के जमाने के बड़े-बड़े करांतिकारी लोग दिल्ली में सहाराश्री-सहाराश्री जपत हउवैं। केहू पतरकार बनत डोलत बा, जोतीबसू का जीवनी लिखत बा त केहू एहर-ओहर पूंजी के दलालन के नाबदान में थूथुन चभोरत बा। आ जे लोग नक्सलबाड़ी में बान-धनुख तनले रहे, उनहू लोगन में केहू मीरघाट-केहू तीरघाट पर आपनि-आपनि मंडली लेके बड़ा जोरदार बहस में जुटल बा साठ साल से कि हमार असली दुसमन के हउवै। एतना साल में त आदमी चाहै त पताल खोदि नावै। धिक्कार बा उनहू लोगन के अइसन जनखा गोलइती प। सुनै में आवत ह कि ऊहो लोगन में केहू क सरदार लेबी के पइसा से अमरीकी शर्ट-बुश्शर्ट पहिनी के अरिमल-परिमल परकासन चलावत बा अपने मेहरी-लइका, साढ़ू-सढ़ुआइन के साथ त केहू तराई में टांगि भचकावत रागमल्हार में डूबलि बा। आज ले केहू से एक तिनको भर नाही उखरल। उनही लोगन में केहू अमेरिका से लौटि के बीबी के पल्लू में एनजीओगीरी करत बा त केहू बिहार अउर आन्हर परदेस के जंगलन में फालूत के धांय-धांय में आपनि ताकत झोंकले बा। अरे बेसरम, तू लोगन के चिल्लू भर पानी में डूबि मरै के चाही कि देखा नैपाल में बिना कौनो डरामा-नौटंकी कैसे बहादुरन की जमाति ने ऊ रजवा के खदेड़ि देहलस...आ तू लोगन अजादी क मशालै पढ़ावति रहि गइला। कहां गइल तोहार आइसा-फाइसा. आइपीएफ-साइपीएफ.... आखिर कब ले तोहन लोगन ढुकारि मारि के दिल्ली के कोने अतरे में फोकट का बुद्धी बघारत रहबा। तोहन लोगन त आपसै में कटि मरबा, जनता के खातिर का कइबा कट्टू? देखा कठपुतली नीयर मनमोहना कैसे चीन अमरीका धांगत हउवै, मर्द त ऊ हउवै, तोहन लोग सारी पहिनि के घूमा ससुरो। किसान मजूर क कलेजा जरी त ओकरे मुंह से ईहै कुल गारी-गुपुत निकली। मरला की हद कइ नउला तोहन लोग। खैर कौनो बात नइखैं। हमरे बस में आजि एतने हउवै कि एही तरहि से तोहन लोगन क खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में। तू लोग नगरी-नगरी द्वारे वैन प लादि के किताब कापी बेचा, क्रांति-स्रांती का नाटक-नौटकी करा, गीत-गाना का सीडी-वोडी बेचा-बिकना, आपन रोजी-रोटी चलावा, बस तोहरे लोगन से आउर कुछ उखरै-परिआए क भरोसै बेकार बा। अकारथ गइलि कुल कुरबानी। जाने केतनी सहीद लोग अपने-अपने कबर में से तोहन लोगन क ई रामलीला देखति होइहैं, जनता त देखती बाय। ई बाति तोहनो लोगन पर लागू हउवै कि... फुहरी गईल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी लगल गावै।

शुक्रवार, 7 मार्च 2008

रउरे बुढि़या के गलवा में क्रीम लागेला, हमरी नइकी के जरि गइलें भाग भाई जी

आज महिला दिवस ह। ईहो एकठो चोचलेबाजी बा। कौनो मुंह बनउले क जरूरत नइखैं। दुनिया भर में दुनिया भर क दिवस मनावै क फैशन स चल गइलि बा। ओही में एक फैशन ईहो हउवै। सरऊ लोग तरह-तरह क तमाशा करत हउवैं। चिढ़ावै के खातिन। कबौं लइकन के चिढ़इहैं, त कबौं बुढ़वन के, कबौं मजदूरन के चिढ़इहैं त कबौं किसानन के... भोजपुरी में एकगो कहावत ह कि ओढ़ौ के दुका नहीं, दरी बिछनौना। दुनिया भर क के गिनावै. अपने आसैपास देखिला, आसैपास का- तनी अपने घरहि में देखिला कि कइसन हाल बा महिला लोगन का। केहू जनमते बेंचि देत ह, केहू गरभ में ही मरवाइ देत ह, त केहू जिनगी भर मारि-मारि के कचूमर निकालि लेत ह।
त भइया ई कुल झांसा-पट्टी क खेल ह। जौन करै के चाही, तौन त केहू कुछ करत-धरत ना ह, महिला दिवस जरूर मनइहैं। अमीरी-गरीबी का खोदि-खोदि के समुंदर बनावत जात हउवैं, पइसा वालन के मेम इसनो-पाउडर चेंपि के रोज-रोज हाट-बाट, माल, मारकेट क धौरहरि मचउले हईं, गरीबन क बिटिया-मेहरारू गिट्टी तोड़त हईं, घास करति हईं, हर जोतत हईं, पत्ता-पन्नी बीनति हईं, त पेट-परदा चलत ह।
केतना महिला संगठन हउवैं, हर पार्टी में महिला विंग अलग से, केतना पंच-परधान मेहरारू हईं, अउर-त-अउर सोनिया गान्ही, मायावती बहिन जइसन दुनिया भर क चौधरानी अपने देश-मुलुक में गद्दी पर बइठि के खूब मजा काटति बानी, आ औरतन क हाल जस क तस बा। वोट लेवै के बेला में ई कुल औरति बनि जालीं, एकरे बाद पांच साल तक के पूछत बा, केहू नइखैं। अब त भइया ई कुल चिरकुटाई सुनत-सुनत जी पकि गइल बा। ई कुल महोखाबाजी अब तनिको बरदास्त ना होत बा। ऊ कुल आपन-आपन चमकीला खतोना बनाइ-बनाइ के हम लोगन के खूब भरमावत हउवैं। छोड़ा जाएदा उनहन क महिला-सहिला दिवस का बात-कुबात...... आवा तनी एही बहाने गीत-गवनई होइ जाय गोरख पांड़े के मुंह-राग से, उनहीं के सबदन में.....

पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइलें त बोले लगलें ना
तोहके खेतवा दिअइबों
तोहके फसलि उगइबो
दूसरे चुनउवा में जब उपरइलें त बोलें लगलें ना
तोहके कुइयां खनइबो
सब पियसिया मिटइबौ
तीसरे चुनउवा में चेहरा दिखइलें त बोले लगलें ना
तोहके महल उठइबों
ओमे बिजुरी लगइबों
अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तू बहुत कइला ना
तोहके अब न थकइबो
आपन हथवा उठइबो
जब हम ईहवों के किलवा ढहइबो त एही हाथे ना
तोहरो मटिया मिलइबो
आपन रजवा बनइबों
......त एही हाथे ना।

सोमवार, 3 मार्च 2008

ऐ कुतिया



तेरी पूंछ इत्ती-सी,
तेरी टांगें इतनी छपक-छरहरी,
तेरी भूंक मीठी-मीठी,
तेरी आंखें गुस्साई हिरनी जैसी
ऐ कुतिया!

तेरी चाल कैट वॉक की,
तेरी मस्तियां पूंजी से पुरजोर,
तेरी चौकदारी अमेरिका-जापान तक,
तेरे कान कितने चौकन्ने,
और तेरी खाल इतनी मोटी क्यों है
ऐ कुतिया!

तेरे आजू-बाजू इतनी धन-दौलत,
तेरे इतने घर-मकान,
तेरे इतने नौकर-चाकर, नाती-पनाती,
बारहो मास कोई राजधानी, कोई पहाड़ों की सैर पर,
तू शेयरों की रानी,
दलालों की दलाल और कुत्तों की कहारन
ऐ कुतिया!

तेरे नाम पर गालियों के मुहावरे हजार,
तेरे गुस्से में बर्बादियों के सात समंदरों की दहाड़,
तेरी नीद में तरह-तरह के किन्नर नरेश,
तेरी सुबहें लहलहाती हुईं,
तेरी रातें कहकहों और ठहाकों से सराबोर,
तेरी चमड़ी इत्ती सुघर-सलोनी
लेकिन तेरा मन
ऐ कुतिया!

कुतिया कहने पर गुस्सा क्यों आता है तुझे,
कुतिया का मतलब गाली क्यों होता है,
कुतिया का दूध पीने वाली औलादें
इतनी खूंख्वार क्यों होती हैं,
अब तुझसे क्या पूछें
और भी क्या-क्या कहें....
ऐ कुतिया!

(तू खुद में एक सवाल है)
(तू खुद में एक जाति है)
(तेरी जाति की हजारों-लाखों दुनिया भर में)
(ऐ कुतिया!)

(भौंकती रह, भौंकती रह)
(भौंकना ही तेरा सौंदर्यशास्त्र है)
(भौंकना तेरा पेशा है)
(भौंकने से परहेज करते ही तू मर जाएगी)
(ऐ कुतिया!)

रविवार, 2 मार्च 2008

कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....



डाल के ऊपर कउवा हौ, कउवा ऊपर कनकउवा

ओकरे उप्पर छउवा ठाकुर बइठल खायं ठोकउवा

कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....


दानापुर दरियाव किनारा, गोलघर निशानी
लाट साहेब ने किला बनाया, क्या गंगा जल पानी


जोगी जी सार रा रा.........


दिल्ली देखो ढाका देखो, शहर देखो कलकत्ता।
एक पेड़ तो ऐसा देखो, फर के ऊपर पत्ता,
जोगी जी सार रा रा............


कौन काठ के बनी खड़ौआ, कौन यार बनाया है,
कौन गुरु की सेवा कीन्हो, कौन खड़ौआ पाया,
चनन काठ के बनी खड़ौआ, बढ़यी यार बनाया हो,
हम गुरु की सेवा कीन्हा, हम खड़ौआ पाया है,
जोगी जी सारा रा रा............


सोमवार, 25 फ़रवरी 2008

फागुन में बाबा देवर लागै

आइ गइलि, आइ गइलि, लउकति ना हउवै त का होइ गइलि, मनवा में त रसमसाती हउवै......भीनति हउवै, गुनगुनाति हउवै...हंसति हउवै, मुसुकाति हउवै, थिरकति हउवै, लहालौट होति हउवै....रंगियाति हउवै, अंगियाति हउवै, अगियाति हउवै अब्बै से होरी .....हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा......
मौसमो मुरुकै लगलि बा, कुहुकै लगलि बा, हुहुकै लगलि बा, लुहुकै लगलि बा, महकै लगलि बा, सहकै लगलि बा, बहकै लगलि बा, रहि-रहि के चहकै लगलि बा, रहि-रहि के दहकै लगलि बा, टहकै लगलि बा, रसे-रसे डहकै लगलि बा, मन भितरें-भितर सहकै लगलि बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा....
अब्बै से रंग चढ़ै लगलि बा, ढंग पढ़ै लगलि बा, पोर-पोर में बसंती कोपल कढ़ै लगलि बा, चिक्कन-चिक्कन रुप-रंग गढ़ै लगलि बा, फगुनौटी का हीरा-मोती जड़ै लगलि बा, चारों ओर फूल-पत्ती झरै लगलि बा, बुढ़उवो से नीक-नइकी डरै लगलि बा, मुनक्का नाईं मनहि-मन ढरै लगलि बा, का जानैं लोग एहि वैलेंटाइन का मरम....तनी-तनी तर-ऊपरि रोम-रोम बरै लगलि बा, नशाइ के आंखि कतहूं..पैर कतहूं परै लगलि बा, अंगूर अइसनि अंग-अंग फरै लगलि बा, जइसे हीया में अमरित भरै लगलि बा..हा-हा-हा-हा-हा-हा.....
पेड़-पौधा सुघराए लगल, हवा-पानी लहराए लगलि, सुरुज क रंग गहराए लगल, चनरमा अंग फहराए लगल, दिन क चलन अहराए लगल, रात चुप्पे-चुप्पे होरिहराए लगल, केहू उझकति बा, केहू चिहुंकत बा, केहू निहुकति बा, केहू टिहुकति बा, केहू अगवारे-पिछवारे रोज पिहुकति बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा........
फागुन मा बाबा देवर लागै।
कबौं एहर, त कब्बौं ओहर लागै।
फागुन मा बुढ़िया जवान लागै।
कबौ बच्ची, त कब्बौ सयान लागै।
फागुन मा रार बेकार लागै।
सब दउरि-दउरि अंकवार लागै।
हा-हा-हा-हा-हा-हा...............

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

फागुन उड़त गुलाब

झूमर चौतार झमारी, तजो बनवारी
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी



धनि-धनि सिया रउरी भाग, राम वर पायो।
लिखि लिखि चिठिया नारद मुनि भेजे, विश्वामित्र पिठायो।
साजि बरात चले राजा दशरथ,
जनकपुरी चलि आयो, राम वर पायो।
वनविरदा से बांस मंगायो, आनन माड़ो छवायो।
कंचन कलस धरतऽ बेदिअन परऽ,
जहाँ मानिक दीप जराए, राम वर पाए।
भए व्याह देव सब हरषत, सखि सब मंगल गाए,
राजा दशरथ द्रव्य लुटाए, राम वर पाए।
धनि -धनि सिया रउरी भाग, राम वर पायो।



शुभ कातिक सिर विचारी, तजो वनवारी।
जेठ मास तन तप्त अंग भावे नहीं सारी, तजो वनवारी।
बाढ़े विरह अषाढ़ देत अद्रा झंकारी, तजो वनवारी।
सावन सेज भयावन लागतऽ,
पिरतम बिनु बुन्द कटारी, तजो वनवारी।
भादो गगन गंभीर पीर अति हृदय मंझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फंसे मुरारी, तजो वनवारी।
कातिव रास रचे मनमोहन,
द्विज पाव में पायल भारी, तजो वनवारी।
अगहन अपित अनेक विकल वृषभानु दुलारी,
पूस लगे तन जाड़ देत कुबजा को गारी।
आवत माघ बसंत जनावत, झूमर चौतार झमारी, तजो वनवारी।
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी,
नहिं भावत बिनु कंत चैत विरहा जल जारी,
दिन छुटकन वैसाख जनावत, ऐसे काम करहु विहारी, तजो वनवारी।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

अंखिया क पुतरी


अंखिया क पुतरी
करेजवा में उतरी
विदेशिया क सुघरी
सगरवा में उतरी
उतरी हो रामा
पुतरी हो रामा
रामा हो रामा....

सूने-सूने डिहवा
मड़ैया सूनी-सूनी
कबौ देहरादूनी
त कबौ टेलीफूनी
मन भइलें खूनी-खूनी
याद आवै दूनादूनी
...अंखिया क पुतरी हो रामा

छुटि गइलैं गउवां
बिलाइ गइलैं नउवां
बालेपन क दिनवा
हो गइलैं महीनवां
नाही केहू आवै ला
ना जालै केहू उहवां
...अंखिया क पुतरी हो रामा

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008

अरे...हाऊ देखा, का होत हउवै

देखबा...देखबा...तनी देखबा-देखबा, हाऊ का होत ह, अरे एतना लोग एक साथ काहें दौड़त हउवै....ऊ कइसन कइसन लोग हउवैं....ओनके का हो गइल ह....एक दमै सनक गयल हउवैं का....कुल क कुल एकै तरह क लउकत हउवैं.....नाही-नाही....ओहमै दू तरह क लोग लउकत हउवैं....आज हमहूं देखि लेहलीं ओनके....जब पढ़ली बेहया का चिट्ठा....आवा तनी मोका निकाल के दू घड़ी तुहूं पढ़ ले जा, त जानि जइबा कि असली बात का ह...ऊ लोग कउन लोग हउवैं....ओनकर कहानी भैया चिट्ठा से उधार लेइके हम इहां आप सबन के पढ़वावत हईं...जस क तस-


(यह ताजा वाकया अमीर घराने का है) सुबह-सुबह पहले तो कुछ-एक लोगों की निगाह उस पर पड़ी, फिर चारों तरफ शोर मच गया। जिसने भी उसे देखा, आंखें फटी-की-फटी रह गईं। सबकी आंखों में एक ही सवाल कि इतना सभ्य और सुदर्शऩ होते हुए भी उसने ऐसा क्यों किया? वह खुद नंगा हुआ या किन्ही बदमाशों ने उसके साथ ये हरकत की? ...और अपनी इस करतूत से अचानक वह अनगिनत महिलाओं-पुरुषों की भीड़ की आंखों में इस तरह धंस गया कि सब-के-सब बुड़बुड़ाने लगे....................यह वाकया है नये साल के दूसरे महीने की पहली तारीख यानी 1 फरवरी की सुबह का। उसे नंगा किया अमीरों की चटोरी करने वाले बुर्जुआ मीडिया ने। उसी मीडिया ने, जो कहता है देश बहुत तेजी से विकास कर रहा है। आए दिन जो देश के अमीरों की नंबरिंग की फेहरिस्त पढ़वाता रहता है। मुद्दत बाद उसने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की एक ताजा रिपोर्ट को पहले-दसरे पन्ने पर प्रमुख स्थान दिया। इस रिपोर्ट ने भारतीय लोकतंत्र को नंगा कर दिया। उन अमीर घरानों और उनके पालतू राजनेताओं के चेहरे से एक झटके में नकाब खींच थी। रिपोर्ट के आईने में सबके सब एक साथ नंगे दौड़ते दिखे। क्या है रिपोर्ट में, एक नजर आप भी जान लें-
-भारत में 17 करोड़ लोग सिर्फ 19 रुपये में रोजाना गुजारा करते हैं। उत्तर प्रदेश का पूरा ग्रामीण इलाका इसी तरह जी रहा है, जबकि बिहार में ग्रामीण सिर्फ 15रुपये में रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
- भारत में लगभग 14करोड़ लोग सिर्फ 12रुपये या इससे भी कम रुपये से रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
-पंजाब और हरियाणा सबसे खुशहाल माने जाते हैं, मीडिया भी इनकी खूब दुंदभी बजाता रहता है, लेकिन नंगी हकीकत ये है कि पंजाब में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 33रुपये और हरियाणा में 25रुपये है।
-रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय ग्रामीण एक महीने में 251रुपये से अपने को जिंदा रखता है।
-ग्रामीणों की आधी आबादी कच्चे या अधपक्के घरों में जीवन बिता रही है। इनमें कच्चे घर वाले 19फीसदी हैं।
-विकास का इतना ढिंढोरा पीटा जा रहा है लेकिन आज भी शहरी आबादी के 45फीसदी लोग ही रसोई गैस पर भोजन पका रहे हैं, जबकि गांवों में 75फीसदी लोग लकड़ी के चूल्हे से काम चला रहे हैं।........इस नंगे लोकतंत्र को देखते हुए ऐसे में कुछ सवाल--कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
-आए दिन देश के अमीरों की फेहरिस्त पढ़वा कर मीडिया आखिर क्या साबित करना चाहता है?
-एक भारतीय ढाई सौ रुपये में महीना काटता है और दूसरे (अंबानी) का व्यक्तिगत मासिक खर्च सवा दो करोड़ क्यों?
-नेता और अफसर तो हैं ही, क्या वे साहित्यकार, पत्रकार, चिंतक, वक्ता, खिलाड़ी, अभिनेता, रंगकर्मी गूंगे-बहरे या दिमागी अपाहिज नहीं हैं, जो ऐसी सच्चाइयां बयान होते ही चुप्पी साध जाते हैं?

....तो भैया
आओ भारतीय लोकतंत्र की हाट सजी है
यहां हर अंग बिकाऊ है
किडनी क्या, जो चाहो खरीद लो जाओ
पहले इनकी चुप्पियां खरीदो
फिर इनकी अक्ल खरीदो
फिर जो चाहो, सब कुछ
लोकतंत्र तो कब का नीलाम हो चुका है
तन-बदन तक नीलाम हो रहा है
अब कब जागोगे
कब तक एक दूसरे से भारतीय संस्कृति और सभ्यता का
सफेद झूठ बोलते रहोगे
यदि तुम ऐसा कर रहे हो
तो इसके सिवाय तुम्हारे पास
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
...क्योंकि तुम मर चुके हो
तुम्हारी आत्मा सड़ चुकी है!
शामिल हो जाओ नंगी दौड़ में,
शामिल तो हो ही,
फास्ट फूड खाओ
दारू पीयो, सिगरेट फूंककर काफी हाउसों में गप्प हांको,
दुनिया भर की बातें करो
और देखो कि तुम कितने नंगे हो चुके हो
....उफ्! अमीरों की खुरचन ने
तुम्हे कितना नंगा कर दिया है?
सुविधाओं ने तुम्हे कितना परजीवी बना दिया है
तो खोखले जी
तुम सिर्फ नंगे ही नहीं
इतने नकली हो गए हो तुम
कि तुम्हारी ही आंखें तुम्हे देखने से मना कर देती हैं
सोचो कि एक दिन में
कितनी बार ऐसा होता है तुम्हारे साथ,
सोचो कि तुम सब कौन हो?
आखिर क्या चाहते हो?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं दिखाई देता?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं सुनाई देता?
यदि तुम सब कुछ देख-सुन कर भी
अनजाने बने हुए हो
.....तो वाकई
तुम कितने नीच हो!!

बुधवार, 30 जनवरी 2008

आज गांन्हीबाबा का पुन्नतीथी न हउवै, त तनी ईहो सुनले जा

बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूंजीपतिया
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए
अपने महलिया में करे उजियरवा
कि बिजरी के रडवा जराए-जराए

कत्तो बने भिटवा कतहूं बने गढ़ई
कत्तो बने महल कतहुं बने मड़ई
मटिया के दियना तूहीं त बुझवाया
कि सोनवा के बेनवा डोलाए-डोलाए

मिलया में खून जरे खेत में पसीनवा
तबहुं न मिलिहैं पेट भर दनवा
अपनी गोदमिया तूहीं त भरवाया
कि बड़े-बड़े बोरवा सियाए-सिआए

राम अउर रहीम के ताके पे धइके लाला
खोई के ईमनवा बटोरे धन काला
देसवा के हमरे तू लूट के खाया
कई गुना दमवा बढ़ाए-बढ़ाए

जे त करे काम, छोट कहलावे
ऊ बा बड़ मन जे जतन बतावे
दस के सासनवा नब्बे पे करवावे
इहे परिपाटी चलाए-चलाए

जुड़ होई छतिया तनिक दऊ बरसा
अब त महलिया में खुलिहैं मदरसा
दुखिया के लरिका पढ़े बदे जइहैं
छोट-बड़ टोलिया बनाए-बनाए

बिनु काटे भिंटवा, गड़हिया न पटिहैं
अपने खुसी से धन-धरती न बटिहैं
जनता केतलवा तिजोरिया पे लगिहैं
कि महल में बजना बजाए-बजाए

.....गांन्ही जी के चेलवा लूटत बांटैं सबके
चोरवन से हथवा मिलाए-मिलाए
देसवा अमेरिका के हथवा में बन्हक
रखि देहलें नेतवा ढुकाए-ढुकाए
अब रजघटवा पै गावै लैं भजनिया
गांन्ही नाई चेहरा झुकाए-झुकाए
...रघुपति राघव राजाराम
पतना न पावैं सीताराम..सित्ताराम...सित्ताराम

शुक्रवार, 25 जनवरी 2008

ए हमार छब्बीस जनवरी

आइ गइलू न, फिर अटकत-मटकत...

ए हमार छब्बीस जनवरी
अबहिन बाकी बा कुछ अउरी?

त आवा तनी गोरख बाबू के सुर में इहो कुल सुनले जा कि तोहके चूमे-चाटे वाले, सलूट मारै वाले का-का करत हउवैं....

रउरा सासना के बाटे ना जवाब भाई जी
रउरा कुरसी से झरेला गुलाब भाई जी

रउरा भोंभा लेके सगरो आवाज करीला
हमरा मुंहवा में लागल बाटे जाब भाई जी

रउरे बुढिया के गलवा में क्रीम लागेला
हमरी नइकी के जरि गइलें भाग भाई जी

रउरे लरिका त पढ़ेला बिलाइत जाइ के
हमरे लरिका के जुरे ना किताब भाई जी

हमरे लरिका के रोटिया पर नून नइखें
रउरा चापीं रोज मुरगा-कबाब भाई जी

रउरे अंगुरी पर पुलिस आउर थाना नाचे ला
हमरे मुअले के होखे न हिसाब भाई जी।

सोमवार, 21 जनवरी 2008

शनिवार, 19 जनवरी 2008

कहंरवा

boomp3.com

खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में

त ई हाल बा आजकल अपने मनमोहन का

दे दनादन दौरा। दे दनादन। अमरिकवा के चरनबंदना से पेट नइखे भरत हौ त कबौं अफरीका क दौरा, कबौं जापान का, कबौं बंगलादेस त कबौं चीन क। एह कुल दौरन क मतलब रउवा सबै जानत बानी की ना। एही कहल जाला आंख एक्को ना, कजरौटा बारह ठो। आ तनी आउर मुंहफटई से कहीं त झोरी में बाल नहीं (बाल ऊ वाला), औ चले जगन्नाथ जी। जहां जहां जात हउवैं, संग-साथ में भड़ैती की खातिर पतरकारन का झुंड पूंछ में लपेटे हुए.... कि आह मनमोहन, वाह मनमोहन......चक दे इंडिया, पक दे इंडिया, फक्क दे इंडिया। सरमायेदारन की सेवकाई में कटोरा लेइके दर-दर डोलत ई मुड़कटवन के का कहलि जाइ कि फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै। त भइया चरनबंदन चहुंओंरी....एही चारन गान पर नीचे कुछ लाइना इहां सुनावति बानी रउवा सबन के.....

समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी।
हाथी से आयी
घोड़ा से आयी
अंगरेजी बाजा बजाई...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

नोटवा से आयी
वोटवा से आयी
बिड़ला के घर में समायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

गांधी से आयी
आंधी से आयी
टुटही मड़इया उड़ायी,...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

कांगरेस से आयी
जनता से आयी
झंडा के बदली हो जायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

डालर से आयी
रूबल से आयी
देसवा के बान्हे धरायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

वादा से आयी
लबादा से आयी
जनता के कुरसी बनायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

लाठी से आयी
गोली से आयी
लेकिन अहिंसा कहायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

महंगी ले आयी
गरीबी ले आयी
केतनो मजूरा कमायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

छोटका के छोटहन
बड़का के बड़हन
बखरा बराबर लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

परसों ले आयी
बरसों ले आयी
हरदम अकासे तकायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

धीरे-धीरे आयी
चुपे-चुपे आयी
अंखियन पर परदा लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।



त भइया, गोरख पांड़े त ई कुल गावत-गावत मरि गइलैं। उनहूं के भला का मालूम रहल कि समजावाद का कमाई-धमाई खाए-खसौटे वाले दलाल टाटा की थैली में मुंह मारि-मारि के सिंदूरग्राम अउर नांदीग्राम में अपने मुंहे करिखा लगाइके थेथर की तरह घूमत बानै आजकल। आ ऊ जमाने के, पांड़े जी के जमाने के बड़े-बड़े करांतिकारी लोग दिल्ली में सहाराश्री-सहाराश्री जपत हउवैं। केहू पतरकार बनत डोलत बा, जोतीबसू का जीवनी लिखत बा त केहू एहर-ओहर पूंजी के दलालन के नाबदान में थूथुन चभोरत बा। आ जे लोग नक्सलबाड़ी में बान-धनुख तनले रहे, उनहू लोगन में केहू मीरघाट-केहू तीरघाट पर आपनि-आपनि मंडली लेके बड़ा जोरदार बहस में जुटल बा साठ साल से कि हमार असली दुसमन के हउवै। एतना साल में त आदमी चाहै त पताल खोदि नावै। धिक्कार बा उनहू लोगन के अइसन जनखा गोलइती प। सुनै में आवत ह कि ऊहो लोगन में केहू क सरदार लेबी के पइसा से अमरीकी शर्ट-बुश्शर्ट पहिनी के अरिमल-परिमल परकासन चलावत बा अपने मेहरी-लइका, साढ़ू-सढ़ुआइन के साथ त केहू तराई में टांगि भचकावत रागमल्हार में डूबलि बा। आज ले केहू से एक तिनको भर नाही उखरल। उनही लोगन में केहू अमेरिका से लौटि के बीबी के पल्लू में एनजीओगीरी करत बा त केहू बिहार अउर आन्हर परदेस के जंगलन में फालूत के धांय-धांय में आपनि ताकत झोंकले बा। अरे बेसरम, तू लोगन के चिल्लू भर पानी में डूबि मरै के चाही कि देखा नैपाल में बिना कौनो डरामा-नौटंकी कैसे बहादुरन की जमाति ने ऊ रजवा के खदेड़ि देहलस...आ तू लोगन अजादी क मशालै पढ़ावति रहि गइला। कहां गइल तोहार आइसा-फाइसा. आइपीएफ-साइपीएफ.... आखिर कब ले तोहन लोगन ढुकारि मारि के दिल्ली के कोने अतरे में फोकट का बुद्धी बघारत रहबा। तोहन लोगन त आपसै में कटि मरबा, जनता के खातिर का कइबा कट्टू?

देखा कठपुतली नीयर मनमोहना कैसे चीन अमरीका धांगत हउवै, मर्द त ऊ हउवै, तोहन लोग सारी पहिनि के घूमा ससुरो। किसान मजूर क कलेजा जरी त ओकरे मुंह से ईहै कुल गारी-गुपुत निकली। मरला की हद कइ नउला तोहन लोग। खैर कौनो बात नइखैं। हमरे बस में आजि एतने हउवै कि एही तरहि से तोहन लोगन क खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में। तू लोग नगरी-नगरी द्वारे वैन प लादि के किताब कापी बेचा, क्रांति-स्रांती का नाटक-नौटकी करा, गीत-गाना का सीडी-वोडी बेचा-बिकना, आपन रोजी-रोटी चलावा, बस तोहरे लोगन से आउर कुछ उखरै-परिआए क भरोसै बेकार बा। अकारथ गइलि कुल कुरबानी। जाने केतनी सहीद लोग अपने-अपने कबर में से तोहन लोगन क ई रामलीला देखति होइहैं, जनता त देखती बाय।
ई बाति तोहनो लोगन पर लागू हउवै कि...
फुहरी गईल दाना भुजावै,
फूटि गइल खपड़ी लगल गावै।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ...तान भोजपुरिया

अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ पूत, खा ले बेटा कहीं सुत।
अइली ना गइली फलांने बो कहइलीं।
- अन्हरा सियार के पीपरै मेवा
अपना बिनु सपना, गोतिया के धन कलपना।
-अपना मने सजनी, के गाँव के लोग कहैं पदनी
-अपना हारल मेहरी के मारल।
- अब्बर क मेहरारू गाँव भर के भउजी
-अहीर बहीर बन बइर के लासा, अहीर पदलेस भइल तमासा।
-आँख के आन्हर गांठ के पुरा।
- आँख एक्को ना, कजरौटा बारह गो
-आँख ना दीदा मांगे मलीदा।
- आइल थोर दिन गइल ढेर दिन।
-आगे नाथ ना पा पगहा।
-आन्हर कुकुर बतासे भोंके ।
- आन्ही के आगे बेना के बतास! (बेनाउपंखा, बतासउहवा)
-आपन निकाल मोर नावे दे।
-आपन आंखि न देखै, दूसरे क ढेंढ़रा निहारै।
-बाबू गुड़ खाई, आपन कान छेदाई।
- इसर निकलस दरिदर पइसस।
-उखड़े बाल नहीं, नाम बरिआर सिंह।
-उपास भला कि मेहरी के जूठ भला !
-एक आन्हर एक कोढ़ी, भले राम मिलवले जोड़ी।
-एक ट्का के मुर्गी नव ट्का के मसाला।
- एक त गउरा अपने गोर, दूसर लहली कमरी ओढ़।
-एक त छ्उँड़ी नचनी, गोड़ में परल बजनी, अउरी हो गइल नचनी।
- एक क लकड़ी, नब्बे खर्च।
-एक हाथ के ककरी, नौ हाथ के बिआ।
-कमाय धोती वाला खाय टोपी वाला।
-कहले से धोबी गदहवा पर ना चढ़े।
- कहाँ राजा भोज कहाँ भोजवा तेली!
- काठ के हँडिया एके बेर चढ़ै ले।
-काम के ना काज के नौ सेर अनाज के।
-बकरा जान संग जाए खवइया के सवादै ना।
-खेत च गदहा मार खाए धोबी।
-गइल भइंस पानी में।
-गया मरद जो खाय खटाई, गई नारि जो खाय मिठाई।
-घर-घर देखा एके लेखा।
-घीव देत घोर नरिया।
-पर लैं राम कुकर के पालै ठेलठाल के कइलैं खाले।

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

जय बाबा कैलाश

उर्फ कवि कैलाश गौतम क गीत-गौनई खरी-खरी





इधर भागती,उधर भागती, नाचा करती हैं,


बड़की भौजी, सबका चेहरा बांचा करती हैं।

-------


गांव गया था, गांव से भागा


सरकारी स्कीम देखकर


बालू में से क्रीम देखकर


देह बनाती टीम देखकर


हवा में उड़ता भीम देखकर


सौ-सौ नीम हकीम देखकर


गिरवी राम-रहीम देखकर


गांव गया था गांव से भागा।



-----------


सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्‍ही जी
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्‍ही जी
तोहरे घर क' रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्‍ही जी
हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती, हउवै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, ऊंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै
भाय भतीया, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै
का बतलाई कहै सुनै मे सरम लगत हौ, गान्‍ही जी
केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्‍ही जी
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्‍ही जी
गाभिन हो कि ठांठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्‍ही जी
जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खालालम्‍बा
टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जालाचाम सोहारी,
काम सरौता, पेटैपेट घोटालाएक्‍को करम न छूटल लेकिन,
चउचक कंठी मालानोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्‍ही जी
हाड़ परल हौ अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्‍ही जी
झगरा क' जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्‍ही जी
खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्‍ही जी
उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्‍बौ हौ
कब्‍बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्‍बौ हौ
दूसर के कब्‍जा में आपन पानी दाना अब्‍बौ हौ
जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्‍बौ हौ
कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्‍ही जी
माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्‍ही जी
चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्‍ही जी
ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्‍ही जी
घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्‍कारी वाले
देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले
इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले
देहलैं खून पसीना देहलैं तब्‍बौ बहिन मतारी वाले
तोहरै नाव बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्‍ही जी
ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हंसत हौ गान्‍ही जी
केहु कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्‍ही जी
कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्‍ही जी
जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै
आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्‍ही जी
आग लगत हौ, धुवां उठत हौ, नाक बजत हौ गान्‍ही जी
करिया अच्‍छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्‍ही जी
एक समय क' बागड़ बिल्‍ला आज भगत हौ गान्‍ही जी

बुधवार, 16 जनवरी 2008

ई बात चंडूखाने क हउवै का?

तीन-चार साल से भोजपुरी का नांव खूब उजियार होत ह। अइसर उजियार कि अन्हारो क सिर सरम से गड़ि जाय। त आपो सबन जानल चाहब कि ऊ कवन लोग हउवैं, जे भोजपुरी क नांव उजियार करै में जुटल हउवैं? त एही बात पर पहिले एक लाइन सुनि ला, फेर बताइब कि जोति जगावै वाले ऊ उजियारघाट वाले लोग कवन-कवन हउवैं?
ऊ लाइन ह....
नान्हे क उढ़री, जब्बै से सुढ़री, तब्बै से सुढ़री,
नइहरे का नांव उजियार कइलै उढ़री।

भोजपुरिया लोग त सगरे देश-दुनिया में छिंटाइल बाड़ैं। आपन घर-दुआर, देस-जवार, आपनि माटी छोड़ि के उनमें से तमाम लोग जहां तहां बसि-बसाइ भी गयल हउवैं, लेकिन उनही लोगन के बीच कुछ नामी-गिरामी नुमा भाई लोग आ कहीं कि दुबई के भाई जइसन भाई लोग ढुकारी मारि के भोजपुरी क मुफ्त में कमाई खात-अघात हउवैं और रहल-सहल डुबावत हउवैं।
अपराधिन की दुनिया में आजमगढ़, गोरखपुर का नांव त दुबई तक गूंजतै बा, झाल-ताशा लेइके कुछ लोग फिल्मी परदवा पर भी खूब इज्जत बोरत हउवैं। कौनो सीडी की दुकान पर जा अउर भोजपुरी के नाम पर कुछ मांगा तो देखावै में दुकानदार त शरम से गड़ी जाला, आसपास खड़ा गराहक भी ऐसे घूरै लगै लैं, जैसे कौनों आदमी के कोठा पर रंगे हाथ पकड़ि लेहले हों। तुलसी बाबा का कहावत बा कि कारन कवन नाथ मोहिं मारा। बात बालि-सुग्रीव की लड़ाई पर कहलि गइलि ह, लेकिन हमरे कलेजे में ई मुहावरा भोजपुरी की खातिर धंसि जाला कि भइया दुनिया भर में काहे के भोजपुरी का नांव बोरत हउवा। ई-टीवी पर भी एक परोगराम में भोजपुरी क खूब काली पताका फहरति रहलि ह। ऊंहा भी ऊहै कुल गाली-जोगिरा वालन क जमावड़ा।
त भइया
सब लाजि-सरम घोरि के पी गयल लोगन से हमार एक नान्ह-एकन मिनती ह कि अपने साहित्य अउर संसकिरिति से एतना अघाइल बोलबानी, इज्जतपानी वाली एहि भोजपुरी क अब अउर दुर्गती मत करा। इहां त एतना अथाह भंडार ह कि जहैं उड़ेला, उहैं जमाना हक्का-बक्का होइ जाई। फिर भोजपुरी के गटर साबित करै पर काहैं उतारू हउवा। वइसे भइया, ऊ लोग मनिहैं ना, काहें से कि ओही गटरबाजी से उनहन क धंधा-पानी चलत ह। उनहन के एतनो लाज-सरम ना ह कि उनहन क करनी उनहन का माई-बहिन भी त देखति होइहैं...ऐं... त भला बतावा कि उन माई-बहिनन के दिल पर का बीतति होई?
जेतनी फूहर-पातर गाना, सब भोजपुरी में।
जेतनी नंगा नाच, सब भोजपुरी में।
धत ससुरे, तोहन क त सकल न देखै लाकि हउवै।
तोहन के चिल्लू भर पानी में डूब मरै के चाही।


त अब आवा मन तनी हलुक करै के खातिन दुइ लाइन होइ जाय, एही बात पर....
जेकरे अंगुरिया पर दुनिया टिकलि बा।
बखरा में ओकरे नरक परलि बा।
जेकरे पसीनवा से अनधन सोनवा,
ओही के चूसि-चूसि बढ़ति बाय तोनवा।
जल्द से जल्द एहि बलाग पर आप लोगन के बढ़िया-बढ़िया भोजपुरी गानो सुनै के मिली खाटी भोजपुरिया में। तनी स अउर धीरज धरा। एहि बलाग के अपने त पढ़ा ही, आउर भाइन के भी पढ़ावा-सुनावा त के जानै भोजपुरी एही मदद से देर-सबेर उज्जर होइ जाय।
...त भइया राम-राम।

आवा हो तनी सुनले जा...

दो भोजपुरिया लुक्का

बाबू आन्हर
माई आन्हर
हमे छोड़
कुल भाई आन्हर,
केके केके
दिया देखाईं
बिजली एस
भौजाई आन्हर।

सरकसई का आलम आया
मरकट्ठों के ठम्म,
तइअक तासा
देख तमासा
झंइक-झंइक झम्म।

सोमवार, 14 जनवरी 2008

छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै

वैसे त हर लोकभाषा में, बोलचाल में मुहावरन क, कहावतन क भरमार होले लेकिन भोजपुरी क खजाना एहि माने सबसे ढेर धनी-मानी मानन जाला। आज आप लोगन के सामने हम कुछ एही तरह का बोली-बानी क खजाना परोसे जाति हईं........

छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै
एकर मतलब होला तिरिया चरित्तर

आंखि एक्को ना, कजरौटा बारह ठो
एहि के दूसरे तरह से भी समझल जा सकै ला.... आंख क आन्हर, नाम बा नयनसुख

ई-बात, ऊ-बात, पड़ाइन तनी सुर्ती दा
माने एहर-ओहर क आलतू फालतू बतकही कइले के बाद मतलब क बात

घर में भूंजल भांग नाही, चलैं जगन्नाथ जी
एहि के दूसरी तरह से भी समझल जा सकै ला........पैसा न कौड़ी, बीच बजार बीच दौड़ा-दौड़ी

मेहरी न लइका, चलैं दुअरिका
माने एकर कुछ-कुछ अइसे भी समझैं कि घर-परिवार का कौनों जर-जिम्मेदारी त हवै ना, कान्ही प गमछा डालि कै चल देहलैं सन्यासी हौवै।

मांस-मछली लइका खांय, हत्या लेहले पाहुन जायं
दूसरे का करनी दूसरे के मत्थे


....त अबहीं त आज ऐतनै....

रविवार, 13 जनवरी 2008

भैया ई नया ब्लॉग ह भोजपुरी क

सच-सच कहीं त हिंदुस्तान का मातृभाषा हिंदी ह अउर हिंदी का मातृभाषा भोजपुरी। उत्तर प्रदेश अउर बिहार के हिंदी पट्टी में भोजपुरी क साहित्यिक खजाना देश के कौनो भी क्षेत्रीय भाषा कोष से बहुत ही अधिक भरल-पुरल हउवै। एकरे इलाका से अइसन-अइसन लिक्खाड़ लोग हिंदी जगत के मिललैं, जिनकर नांव आजौ देश-दुनिया में बड़े आदर से लेहल जाला। भिखारी ठाकुर त फिल्मी पताका फहरौलही रहलैं आ आज तक ओनकर नाम लेत ही मन में माटी की धुन बजै लगैले, हिंदी साहित्य क अकाश आज भी जिनके नाम से जगमगात हउवै, उनही लोगन में हउवैं पंडित रामचंदर शुकुल, सूरजकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वरमा, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्रिवेदी, पं.श्याम नरायन पांडे हल्दी घाटी वाले, रामधारी सिंह दिनकर, सुदामा तिवारी धूमिल, हरवंश राय बच्चन, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, अउर आज कल डा.नामवर सिंह, डा.काशीनाथ सिंह,........केतना गिनाईं। फिल्मी दुनिया में त मनोज तिवारी धूम मचउलही हउवैं। एक जमाने में रमई काका, कैलाश गौतम, हरीभैया यानी हरेराम द्विववेदी, चंद्रशेखर मिसिर, डा.श्याम तिवारी, चकाचक बनारसी, भैया जी बनारसी, श्रीकृष्ण तिवारी, भोलानाथ गहमरी, रूपनारायण तिवारी, क्षेम जी, तिरलोकी, और दूर-दूर तक गूंजै वाला नाम मोती बीए। अउर केतना-केतना गिनाईं। इहां नांव गिनावे का मकसद ना हउवै। बस एतना बताइ देईं कि भोजपुरी क खजाना केतना भरल-पूरल हउवै। भोजपुरी का झंडा आज भी हिंदुस्तान के हरकोने में ही नहीं , दुनिया भर में मारिशस से अमेरिका-ब्रिटेन तक लहरात हउवै। हजारों भाई बहन एही इलाके से निकलि के जाने कहां-कहां तक बिराजि गइलें। अपने देश में त बड़े-बड़े नेता-परेता एहि इलाके से भइलैं ही, भारत के बाहर भी राष्ट्रपति, परधानमंत्री इहा के लोग होइ चुकल बाटैं। मारिशस त भोजरी का भंडार ही कहल जाला।
त अबहिन बस ऐतने जान-पहचानि के लिए।
आगे एहि ब्लॉग पर आप लोगन क कृपा बनल रहलि त बहुत कुछ पढ़ै-सुनै के मिली। अपने सभी भोजपुरी भाइन से गुहार ह कि अगर ऊ कुछ लिखे-पढ़ै के लिए गावै-सुनावै के लिए एहि ब्लाग का जरूरत महसूस करिहैं त हम सीना खोलि के उनके सामने हाजिर मिलब। आखिर में आप सब ई जानि लेईं कि जहां तक भोज में पूरी चलैले, उहां तक भोजपुरी का राजपाट हउवै। शायद एही से एकर नाम भोजपुरी परल।

सिर झुकाइ कै सब भोजपुरी भाई-बहिन लोगन के राम-राम।

सपन एक देखलीं

सूतल रहलीं
सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया।
फूटलि किरनिया
पुरुब असमनवा
उजर घर-आंगन हो सखिया।
अखिया के नीरवा
भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया।
गोसयां के लठिया
मुरइया अस तोरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया।
केहू नाहीं ऊंच-नीच
केहू का ना भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया।
बइरी पइसवा के
रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया।
(इ गोरख पांड़े क गीत हउवै)

शनिवार, 12 जनवरी 2008

रउआ सबके राम-राम

भोजपुरी की दुनिया अब बड़ी भारी होइ गइल बा। इहां से उहां तक। सगरे जगत में आज एकर तूती बोलति हउवै। का किताब, का फिलिम, चारों ओर भोजपुरिया का बहार आइल बा। हमरे भोजपुरी भाई-बहन सगरी दुनिया में बिछल हउवैं. त ओही लोगन की खातिर ई ब्लाग से हम रास रचाइ लेहलीं। अब ई ब्लॉग पर आप सबन के भोजपुरी के गीत-गाना खूब सुने के मिली। अब ही त बस एतनी। आप सबके राम-राम।