शनिवार, 19 जनवरी 2008

कहंरवा

boomp3.com

खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में

त ई हाल बा आजकल अपने मनमोहन का

दे दनादन दौरा। दे दनादन। अमरिकवा के चरनबंदना से पेट नइखे भरत हौ त कबौं अफरीका क दौरा, कबौं जापान का, कबौं बंगलादेस त कबौं चीन क। एह कुल दौरन क मतलब रउवा सबै जानत बानी की ना। एही कहल जाला आंख एक्को ना, कजरौटा बारह ठो। आ तनी आउर मुंहफटई से कहीं त झोरी में बाल नहीं (बाल ऊ वाला), औ चले जगन्नाथ जी। जहां जहां जात हउवैं, संग-साथ में भड़ैती की खातिर पतरकारन का झुंड पूंछ में लपेटे हुए.... कि आह मनमोहन, वाह मनमोहन......चक दे इंडिया, पक दे इंडिया, फक्क दे इंडिया। सरमायेदारन की सेवकाई में कटोरा लेइके दर-दर डोलत ई मुड़कटवन के का कहलि जाइ कि फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै। त भइया चरनबंदन चहुंओंरी....एही चारन गान पर नीचे कुछ लाइना इहां सुनावति बानी रउवा सबन के.....

समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी।
हाथी से आयी
घोड़ा से आयी
अंगरेजी बाजा बजाई...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

नोटवा से आयी
वोटवा से आयी
बिड़ला के घर में समायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

गांधी से आयी
आंधी से आयी
टुटही मड़इया उड़ायी,...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

कांगरेस से आयी
जनता से आयी
झंडा के बदली हो जायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

डालर से आयी
रूबल से आयी
देसवा के बान्हे धरायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

वादा से आयी
लबादा से आयी
जनता के कुरसी बनायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

लाठी से आयी
गोली से आयी
लेकिन अहिंसा कहायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

महंगी ले आयी
गरीबी ले आयी
केतनो मजूरा कमायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

छोटका के छोटहन
बड़का के बड़हन
बखरा बराबर लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

परसों ले आयी
बरसों ले आयी
हरदम अकासे तकायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

धीरे-धीरे आयी
चुपे-चुपे आयी
अंखियन पर परदा लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।



त भइया, गोरख पांड़े त ई कुल गावत-गावत मरि गइलैं। उनहूं के भला का मालूम रहल कि समजावाद का कमाई-धमाई खाए-खसौटे वाले दलाल टाटा की थैली में मुंह मारि-मारि के सिंदूरग्राम अउर नांदीग्राम में अपने मुंहे करिखा लगाइके थेथर की तरह घूमत बानै आजकल। आ ऊ जमाने के, पांड़े जी के जमाने के बड़े-बड़े करांतिकारी लोग दिल्ली में सहाराश्री-सहाराश्री जपत हउवैं। केहू पतरकार बनत डोलत बा, जोतीबसू का जीवनी लिखत बा त केहू एहर-ओहर पूंजी के दलालन के नाबदान में थूथुन चभोरत बा। आ जे लोग नक्सलबाड़ी में बान-धनुख तनले रहे, उनहू लोगन में केहू मीरघाट-केहू तीरघाट पर आपनि-आपनि मंडली लेके बड़ा जोरदार बहस में जुटल बा साठ साल से कि हमार असली दुसमन के हउवै। एतना साल में त आदमी चाहै त पताल खोदि नावै। धिक्कार बा उनहू लोगन के अइसन जनखा गोलइती प। सुनै में आवत ह कि ऊहो लोगन में केहू क सरदार लेबी के पइसा से अमरीकी शर्ट-बुश्शर्ट पहिनी के अरिमल-परिमल परकासन चलावत बा अपने मेहरी-लइका, साढ़ू-सढ़ुआइन के साथ त केहू तराई में टांगि भचकावत रागमल्हार में डूबलि बा। आज ले केहू से एक तिनको भर नाही उखरल। उनही लोगन में केहू अमेरिका से लौटि के बीबी के पल्लू में एनजीओगीरी करत बा त केहू बिहार अउर आन्हर परदेस के जंगलन में फालूत के धांय-धांय में आपनि ताकत झोंकले बा। अरे बेसरम, तू लोगन के चिल्लू भर पानी में डूबि मरै के चाही कि देखा नैपाल में बिना कौनो डरामा-नौटंकी कैसे बहादुरन की जमाति ने ऊ रजवा के खदेड़ि देहलस...आ तू लोगन अजादी क मशालै पढ़ावति रहि गइला। कहां गइल तोहार आइसा-फाइसा. आइपीएफ-साइपीएफ.... आखिर कब ले तोहन लोगन ढुकारि मारि के दिल्ली के कोने अतरे में फोकट का बुद्धी बघारत रहबा। तोहन लोगन त आपसै में कटि मरबा, जनता के खातिर का कइबा कट्टू?

देखा कठपुतली नीयर मनमोहना कैसे चीन अमरीका धांगत हउवै, मर्द त ऊ हउवै, तोहन लोग सारी पहिनि के घूमा ससुरो। किसान मजूर क कलेजा जरी त ओकरे मुंह से ईहै कुल गारी-गुपुत निकली। मरला की हद कइ नउला तोहन लोग। खैर कौनो बात नइखैं। हमरे बस में आजि एतने हउवै कि एही तरहि से तोहन लोगन क खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में। तू लोग नगरी-नगरी द्वारे वैन प लादि के किताब कापी बेचा, क्रांति-स्रांती का नाटक-नौटकी करा, गीत-गाना का सीडी-वोडी बेचा-बिकना, आपन रोजी-रोटी चलावा, बस तोहरे लोगन से आउर कुछ उखरै-परिआए क भरोसै बेकार बा। अकारथ गइलि कुल कुरबानी। जाने केतनी सहीद लोग अपने-अपने कबर में से तोहन लोगन क ई रामलीला देखति होइहैं, जनता त देखती बाय।
ई बाति तोहनो लोगन पर लागू हउवै कि...
फुहरी गईल दाना भुजावै,
फूटि गइल खपड़ी लगल गावै।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ...तान भोजपुरिया

अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ पूत, खा ले बेटा कहीं सुत।
अइली ना गइली फलांने बो कहइलीं।
- अन्हरा सियार के पीपरै मेवा
अपना बिनु सपना, गोतिया के धन कलपना।
-अपना मने सजनी, के गाँव के लोग कहैं पदनी
-अपना हारल मेहरी के मारल।
- अब्बर क मेहरारू गाँव भर के भउजी
-अहीर बहीर बन बइर के लासा, अहीर पदलेस भइल तमासा।
-आँख के आन्हर गांठ के पुरा।
- आँख एक्को ना, कजरौटा बारह गो
-आँख ना दीदा मांगे मलीदा।
- आइल थोर दिन गइल ढेर दिन।
-आगे नाथ ना पा पगहा।
-आन्हर कुकुर बतासे भोंके ।
- आन्ही के आगे बेना के बतास! (बेनाउपंखा, बतासउहवा)
-आपन निकाल मोर नावे दे।
-आपन आंखि न देखै, दूसरे क ढेंढ़रा निहारै।
-बाबू गुड़ खाई, आपन कान छेदाई।
- इसर निकलस दरिदर पइसस।
-उखड़े बाल नहीं, नाम बरिआर सिंह।
-उपास भला कि मेहरी के जूठ भला !
-एक आन्हर एक कोढ़ी, भले राम मिलवले जोड़ी।
-एक ट्का के मुर्गी नव ट्का के मसाला।
- एक त गउरा अपने गोर, दूसर लहली कमरी ओढ़।
-एक त छ्उँड़ी नचनी, गोड़ में परल बजनी, अउरी हो गइल नचनी।
- एक क लकड़ी, नब्बे खर्च।
-एक हाथ के ककरी, नौ हाथ के बिआ।
-कमाय धोती वाला खाय टोपी वाला।
-कहले से धोबी गदहवा पर ना चढ़े।
- कहाँ राजा भोज कहाँ भोजवा तेली!
- काठ के हँडिया एके बेर चढ़ै ले।
-काम के ना काज के नौ सेर अनाज के।
-बकरा जान संग जाए खवइया के सवादै ना।
-खेत च गदहा मार खाए धोबी।
-गइल भइंस पानी में।
-गया मरद जो खाय खटाई, गई नारि जो खाय मिठाई।
-घर-घर देखा एके लेखा।
-घीव देत घोर नरिया।
-पर लैं राम कुकर के पालै ठेलठाल के कइलैं खाले।

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

जय बाबा कैलाश

उर्फ कवि कैलाश गौतम क गीत-गौनई खरी-खरी





इधर भागती,उधर भागती, नाचा करती हैं,


बड़की भौजी, सबका चेहरा बांचा करती हैं।

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गांव गया था, गांव से भागा


सरकारी स्कीम देखकर


बालू में से क्रीम देखकर


देह बनाती टीम देखकर


हवा में उड़ता भीम देखकर


सौ-सौ नीम हकीम देखकर


गिरवी राम-रहीम देखकर


गांव गया था गांव से भागा।



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सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्‍ही जी
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्‍ही जी
तोहरे घर क' रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्‍ही जी
हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती, हउवै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, ऊंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै
भाय भतीया, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै
का बतलाई कहै सुनै मे सरम लगत हौ, गान्‍ही जी
केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्‍ही जी
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्‍ही जी
गाभिन हो कि ठांठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्‍ही जी
जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खालालम्‍बा
टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जालाचाम सोहारी,
काम सरौता, पेटैपेट घोटालाएक्‍को करम न छूटल लेकिन,
चउचक कंठी मालानोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्‍ही जी
हाड़ परल हौ अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्‍ही जी
झगरा क' जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्‍ही जी
खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्‍ही जी
उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्‍बौ हौ
कब्‍बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्‍बौ हौ
दूसर के कब्‍जा में आपन पानी दाना अब्‍बौ हौ
जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्‍बौ हौ
कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्‍ही जी
माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्‍ही जी
चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्‍ही जी
ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्‍ही जी
घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्‍कारी वाले
देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले
इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले
देहलैं खून पसीना देहलैं तब्‍बौ बहिन मतारी वाले
तोहरै नाव बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्‍ही जी
ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हंसत हौ गान्‍ही जी
केहु कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्‍ही जी
कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्‍ही जी
जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै
आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्‍ही जी
आग लगत हौ, धुवां उठत हौ, नाक बजत हौ गान्‍ही जी
करिया अच्‍छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्‍ही जी
एक समय क' बागड़ बिल्‍ला आज भगत हौ गान्‍ही जी

बुधवार, 16 जनवरी 2008

ई बात चंडूखाने क हउवै का?

तीन-चार साल से भोजपुरी का नांव खूब उजियार होत ह। अइसर उजियार कि अन्हारो क सिर सरम से गड़ि जाय। त आपो सबन जानल चाहब कि ऊ कवन लोग हउवैं, जे भोजपुरी क नांव उजियार करै में जुटल हउवैं? त एही बात पर पहिले एक लाइन सुनि ला, फेर बताइब कि जोति जगावै वाले ऊ उजियारघाट वाले लोग कवन-कवन हउवैं?
ऊ लाइन ह....
नान्हे क उढ़री, जब्बै से सुढ़री, तब्बै से सुढ़री,
नइहरे का नांव उजियार कइलै उढ़री।

भोजपुरिया लोग त सगरे देश-दुनिया में छिंटाइल बाड़ैं। आपन घर-दुआर, देस-जवार, आपनि माटी छोड़ि के उनमें से तमाम लोग जहां तहां बसि-बसाइ भी गयल हउवैं, लेकिन उनही लोगन के बीच कुछ नामी-गिरामी नुमा भाई लोग आ कहीं कि दुबई के भाई जइसन भाई लोग ढुकारी मारि के भोजपुरी क मुफ्त में कमाई खात-अघात हउवैं और रहल-सहल डुबावत हउवैं।
अपराधिन की दुनिया में आजमगढ़, गोरखपुर का नांव त दुबई तक गूंजतै बा, झाल-ताशा लेइके कुछ लोग फिल्मी परदवा पर भी खूब इज्जत बोरत हउवैं। कौनो सीडी की दुकान पर जा अउर भोजपुरी के नाम पर कुछ मांगा तो देखावै में दुकानदार त शरम से गड़ी जाला, आसपास खड़ा गराहक भी ऐसे घूरै लगै लैं, जैसे कौनों आदमी के कोठा पर रंगे हाथ पकड़ि लेहले हों। तुलसी बाबा का कहावत बा कि कारन कवन नाथ मोहिं मारा। बात बालि-सुग्रीव की लड़ाई पर कहलि गइलि ह, लेकिन हमरे कलेजे में ई मुहावरा भोजपुरी की खातिर धंसि जाला कि भइया दुनिया भर में काहे के भोजपुरी का नांव बोरत हउवा। ई-टीवी पर भी एक परोगराम में भोजपुरी क खूब काली पताका फहरति रहलि ह। ऊंहा भी ऊहै कुल गाली-जोगिरा वालन क जमावड़ा।
त भइया
सब लाजि-सरम घोरि के पी गयल लोगन से हमार एक नान्ह-एकन मिनती ह कि अपने साहित्य अउर संसकिरिति से एतना अघाइल बोलबानी, इज्जतपानी वाली एहि भोजपुरी क अब अउर दुर्गती मत करा। इहां त एतना अथाह भंडार ह कि जहैं उड़ेला, उहैं जमाना हक्का-बक्का होइ जाई। फिर भोजपुरी के गटर साबित करै पर काहैं उतारू हउवा। वइसे भइया, ऊ लोग मनिहैं ना, काहें से कि ओही गटरबाजी से उनहन क धंधा-पानी चलत ह। उनहन के एतनो लाज-सरम ना ह कि उनहन क करनी उनहन का माई-बहिन भी त देखति होइहैं...ऐं... त भला बतावा कि उन माई-बहिनन के दिल पर का बीतति होई?
जेतनी फूहर-पातर गाना, सब भोजपुरी में।
जेतनी नंगा नाच, सब भोजपुरी में।
धत ससुरे, तोहन क त सकल न देखै लाकि हउवै।
तोहन के चिल्लू भर पानी में डूब मरै के चाही।


त अब आवा मन तनी हलुक करै के खातिन दुइ लाइन होइ जाय, एही बात पर....
जेकरे अंगुरिया पर दुनिया टिकलि बा।
बखरा में ओकरे नरक परलि बा।
जेकरे पसीनवा से अनधन सोनवा,
ओही के चूसि-चूसि बढ़ति बाय तोनवा।
जल्द से जल्द एहि बलाग पर आप लोगन के बढ़िया-बढ़िया भोजपुरी गानो सुनै के मिली खाटी भोजपुरिया में। तनी स अउर धीरज धरा। एहि बलाग के अपने त पढ़ा ही, आउर भाइन के भी पढ़ावा-सुनावा त के जानै भोजपुरी एही मदद से देर-सबेर उज्जर होइ जाय।
...त भइया राम-राम।

आवा हो तनी सुनले जा...

दो भोजपुरिया लुक्का

बाबू आन्हर
माई आन्हर
हमे छोड़
कुल भाई आन्हर,
केके केके
दिया देखाईं
बिजली एस
भौजाई आन्हर।

सरकसई का आलम आया
मरकट्ठों के ठम्म,
तइअक तासा
देख तमासा
झंइक-झंइक झम्म।

सोमवार, 14 जनवरी 2008

छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै

वैसे त हर लोकभाषा में, बोलचाल में मुहावरन क, कहावतन क भरमार होले लेकिन भोजपुरी क खजाना एहि माने सबसे ढेर धनी-मानी मानन जाला। आज आप लोगन के सामने हम कुछ एही तरह का बोली-बानी क खजाना परोसे जाति हईं........

छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै
एकर मतलब होला तिरिया चरित्तर

आंखि एक्को ना, कजरौटा बारह ठो
एहि के दूसरे तरह से भी समझल जा सकै ला.... आंख क आन्हर, नाम बा नयनसुख

ई-बात, ऊ-बात, पड़ाइन तनी सुर्ती दा
माने एहर-ओहर क आलतू फालतू बतकही कइले के बाद मतलब क बात

घर में भूंजल भांग नाही, चलैं जगन्नाथ जी
एहि के दूसरी तरह से भी समझल जा सकै ला........पैसा न कौड़ी, बीच बजार बीच दौड़ा-दौड़ी

मेहरी न लइका, चलैं दुअरिका
माने एकर कुछ-कुछ अइसे भी समझैं कि घर-परिवार का कौनों जर-जिम्मेदारी त हवै ना, कान्ही प गमछा डालि कै चल देहलैं सन्यासी हौवै।

मांस-मछली लइका खांय, हत्या लेहले पाहुन जायं
दूसरे का करनी दूसरे के मत्थे


....त अबहीं त आज ऐतनै....

रविवार, 13 जनवरी 2008

भैया ई नया ब्लॉग ह भोजपुरी क

सच-सच कहीं त हिंदुस्तान का मातृभाषा हिंदी ह अउर हिंदी का मातृभाषा भोजपुरी। उत्तर प्रदेश अउर बिहार के हिंदी पट्टी में भोजपुरी क साहित्यिक खजाना देश के कौनो भी क्षेत्रीय भाषा कोष से बहुत ही अधिक भरल-पुरल हउवै। एकरे इलाका से अइसन-अइसन लिक्खाड़ लोग हिंदी जगत के मिललैं, जिनकर नांव आजौ देश-दुनिया में बड़े आदर से लेहल जाला। भिखारी ठाकुर त फिल्मी पताका फहरौलही रहलैं आ आज तक ओनकर नाम लेत ही मन में माटी की धुन बजै लगैले, हिंदी साहित्य क अकाश आज भी जिनके नाम से जगमगात हउवै, उनही लोगन में हउवैं पंडित रामचंदर शुकुल, सूरजकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वरमा, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्रिवेदी, पं.श्याम नरायन पांडे हल्दी घाटी वाले, रामधारी सिंह दिनकर, सुदामा तिवारी धूमिल, हरवंश राय बच्चन, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, अउर आज कल डा.नामवर सिंह, डा.काशीनाथ सिंह,........केतना गिनाईं। फिल्मी दुनिया में त मनोज तिवारी धूम मचउलही हउवैं। एक जमाने में रमई काका, कैलाश गौतम, हरीभैया यानी हरेराम द्विववेदी, चंद्रशेखर मिसिर, डा.श्याम तिवारी, चकाचक बनारसी, भैया जी बनारसी, श्रीकृष्ण तिवारी, भोलानाथ गहमरी, रूपनारायण तिवारी, क्षेम जी, तिरलोकी, और दूर-दूर तक गूंजै वाला नाम मोती बीए। अउर केतना-केतना गिनाईं। इहां नांव गिनावे का मकसद ना हउवै। बस एतना बताइ देईं कि भोजपुरी क खजाना केतना भरल-पूरल हउवै। भोजपुरी का झंडा आज भी हिंदुस्तान के हरकोने में ही नहीं , दुनिया भर में मारिशस से अमेरिका-ब्रिटेन तक लहरात हउवै। हजारों भाई बहन एही इलाके से निकलि के जाने कहां-कहां तक बिराजि गइलें। अपने देश में त बड़े-बड़े नेता-परेता एहि इलाके से भइलैं ही, भारत के बाहर भी राष्ट्रपति, परधानमंत्री इहा के लोग होइ चुकल बाटैं। मारिशस त भोजरी का भंडार ही कहल जाला।
त अबहिन बस ऐतने जान-पहचानि के लिए।
आगे एहि ब्लॉग पर आप लोगन क कृपा बनल रहलि त बहुत कुछ पढ़ै-सुनै के मिली। अपने सभी भोजपुरी भाइन से गुहार ह कि अगर ऊ कुछ लिखे-पढ़ै के लिए गावै-सुनावै के लिए एहि ब्लाग का जरूरत महसूस करिहैं त हम सीना खोलि के उनके सामने हाजिर मिलब। आखिर में आप सब ई जानि लेईं कि जहां तक भोज में पूरी चलैले, उहां तक भोजपुरी का राजपाट हउवै। शायद एही से एकर नाम भोजपुरी परल।

सिर झुकाइ कै सब भोजपुरी भाई-बहिन लोगन के राम-राम।

सपन एक देखलीं

सूतल रहलीं
सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया।
फूटलि किरनिया
पुरुब असमनवा
उजर घर-आंगन हो सखिया।
अखिया के नीरवा
भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया।
गोसयां के लठिया
मुरइया अस तोरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया।
केहू नाहीं ऊंच-नीच
केहू का ना भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया।
बइरी पइसवा के
रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया।
(इ गोरख पांड़े क गीत हउवै)