सोमवार, 14 जनवरी 2008

छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै

वैसे त हर लोकभाषा में, बोलचाल में मुहावरन क, कहावतन क भरमार होले लेकिन भोजपुरी क खजाना एहि माने सबसे ढेर धनी-मानी मानन जाला। आज आप लोगन के सामने हम कुछ एही तरह का बोली-बानी क खजाना परोसे जाति हईं........

छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै
एकर मतलब होला तिरिया चरित्तर

आंखि एक्को ना, कजरौटा बारह ठो
एहि के दूसरे तरह से भी समझल जा सकै ला.... आंख क आन्हर, नाम बा नयनसुख

ई-बात, ऊ-बात, पड़ाइन तनी सुर्ती दा
माने एहर-ओहर क आलतू फालतू बतकही कइले के बाद मतलब क बात

घर में भूंजल भांग नाही, चलैं जगन्नाथ जी
एहि के दूसरी तरह से भी समझल जा सकै ला........पैसा न कौड़ी, बीच बजार बीच दौड़ा-दौड़ी

मेहरी न लइका, चलैं दुअरिका
माने एकर कुछ-कुछ अइसे भी समझैं कि घर-परिवार का कौनों जर-जिम्मेदारी त हवै ना, कान्ही प गमछा डालि कै चल देहलैं सन्यासी हौवै।

मांस-मछली लइका खांय, हत्या लेहले पाहुन जायं
दूसरे का करनी दूसरे के मत्थे


....त अबहीं त आज ऐतनै....

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