गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

अंखिया क पुतरी


अंखिया क पुतरी
करेजवा में उतरी
विदेशिया क सुघरी
सगरवा में उतरी
उतरी हो रामा
पुतरी हो रामा
रामा हो रामा....

सूने-सूने डिहवा
मड़ैया सूनी-सूनी
कबौ देहरादूनी
त कबौ टेलीफूनी
मन भइलें खूनी-खूनी
याद आवै दूनादूनी
...अंखिया क पुतरी हो रामा

छुटि गइलैं गउवां
बिलाइ गइलैं नउवां
बालेपन क दिनवा
हो गइलैं महीनवां
नाही केहू आवै ला
ना जालै केहू उहवां
...अंखिया क पुतरी हो रामा

2 टिप्‍पणियां:

अनिल रघुराज ने कहा…

अंखिया क पुतरी, करेजवा में उतरी
पुतरी तोहकां लइकै ना
मुझे कुछ ऐसी लाइन याद आ रही है...

बेनामी ने कहा…

ऐ कुतिया





तेरी पूंछ इत्ती-सी,
तेरी टांगें इतनी छपक-छरहरी,
तेरी भूंक मीठी-मीठी,
तेरी आंखें गुस्साई हिरनी जैसी
ऐ कुतिया!


तेरी चाल कैट वॉक की,
तेरी मस्तियां पूंजी से पुरजोर,
तेरी चौकदारी अमेरिका-जापान तक,
तेरे कान कितने चौकन्ने,
और तेरी खाल इतनी मोटी क्यों है
ऐ कुतिया!


तेरे आजू-बाजू इतनी धन-दौलत,
तेरे इतने घर-मकान,
तेरे इतने नौकर-चाकर, नाती-पनाती,
बारहो मास कोई राजधानी, कोई पहाड़ों की सैर पर,
तू शेयरों की रानी,
दलालों की दलाल और कुत्तों की कहारन
ऐ कुतिया!


तेरे नाम पर गालियों के मुहावरे हजार,
तेरे गुस्से में बर्बादियों के सात समंदरों की दहाड़,
तेरी नीद में तरह-तरह के किन्नर नरेश,
तेरी सुबहें लहलहाती हुईं,
तेरी रातें कहकहों और ठहाकों से सराबोर,
तेरी चमड़ी इत्ती सुघर-सलोनी
लेकिन तेरा मन
ऐ कुतिया!


कुतिया कहने पर गुस्सा क्यों आता है तुझे,
कुतिया का मतलब गाली क्यों होता है,
कुतिया का दूध पीने वाली औलादें
इतनी खूंख्वार क्यों होती हैं,
अब तुझसे क्या पूछें
और भी क्या-क्या कहें....
ऐ कुतिया!


(तू खुद में एक सवाल है)
(तू खुद में एक जाति है)
(तेरी जाति की हजारों-लाखों दुनिया भर में)
(ऐ कुतिया!)


(भौंकती रह, भौंकती रह)
(भौंकना ही तेरा सौंदर्यशास्त्र है)
(भौंकना तेरा पेशा है)
(भौंकने से परहेज करते ही तू मर जाएगी)
(ऐ कुतिया!)

प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 11:02 PM 1 टिप्पणियाँ
लेबल: जेपी नारायण की कविता
Sunday, March 2, 2008
कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....





डाल के ऊपर कउवा हौ, कउवा ऊपर कनकउवा

ओकरे उप्पर छउवा ठाकुर बइठल खायं ठोकउवा

कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....



दानापुर दरियाव किनारा, गोलघर निशानी
लाट साहेब ने किला बनाया, क्या गंगा जल पानी



जोगी जी सार रा रा.........



दिल्ली देखो ढाका देखो, शहर देखो कलकत्ता।
एक पेड़ तो ऐसा देखो, फर के ऊपर पत्ता,
जोगी जी सार रा रा............



कौन काठ के बनी खड़ौआ, कौन यार बनाया है,
कौन गुरु की सेवा कीन्हो, कौन खड़ौआ पाया,
चनन काठ के बनी खड़ौआ, बढ़यी यार बनाया हो,
हम गुरु की सेवा कीन्हा, हम खड़ौआ पाया है,
जोगी जी सारा रा रा............





प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 8:22 PM 3 टिप्पणियाँ
लेबल: फगुनवा बहुतै नाच नचावै
Monday, February 25, 2008
फागुन में बाबा देवर लागै
आइ गइलि, आइ गइलि, लउकति ना हउवै त का होइ गइलि, मनवा में त रसमसाती हउवै......भीनति हउवै, गुनगुनाति हउवै...हंसति हउवै, मुसुकाति हउवै, थिरकति हउवै, लहालौट होति हउवै....रंगियाति हउवै, अंगियाति हउवै, अगियाति हउवै अब्बै से होरी .....हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा......
मौसमो मुरुकै लगलि बा, कुहुकै लगलि बा, हुहुकै लगलि बा, लुहुकै लगलि बा, महकै लगलि बा, सहकै लगलि बा, बहकै लगलि बा, रहि-रहि के चहकै लगलि बा, रहि-रहि के दहकै लगलि बा, टहकै लगलि बा, रसे-रसे डहकै लगलि बा, मन भितरें-भितर सहकै लगलि बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा....
अब्बै से रंग चढ़ै लगलि बा, ढंग पढ़ै लगलि बा, पोर-पोर में बसंती कोपल कढ़ै लगलि बा, चिक्कन-चिक्कन रुप-रंग गढ़ै लगलि बा, फगुनौटी का हीरा-मोती जड़ै लगलि बा, चारों ओर फूल-पत्ती झरै लगलि बा, बुढ़उवो से नीक-नइकी डरै लगलि बा, मुनक्का नाईं मनहि-मन ढरै लगलि बा, का जानैं लोग एहि वैलेंटाइन का मरम....तनी-तनी तर-ऊपरि रोम-रोम बरै लगलि बा, नशाइ के आंखि कतहूं..पैर कतहूं परै लगलि बा, अंगूर अइसनि अंग-अंग फरै लगलि बा, जइसे हीया में अमरित भरै लगलि बा..हा-हा-हा-हा-हा-हा.....
पेड़-पौधा सुघराए लगल, हवा-पानी लहराए लगलि, सुरुज क रंग गहराए लगल, चनरमा अंग फहराए लगल, दिन क चलन अहराए लगल, रात चुप्पे-चुप्पे होरिहराए लगल, केहू उझकति बा, केहू चिहुंकत बा, केहू निहुकति बा, केहू टिहुकति बा, केहू अगवारे-पिछवारे रोज पिहुकति बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा........
फागुन मा बाबा देवर लागै।
कबौं एहर, त कब्बौं ओहर लागै।
फागुन मा बुढ़िया जवान लागै।
कबौ बच्ची, त कब्बौ सयान लागै।
फागुन मा रार बेकार लागै।
सब दउरि-दउरि अंकवार लागै।
हा-हा-हा-हा-हा-हा...............

प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 1:29 AM 0 टिप्पणियाँ
लेबल: होरी खेलैं रघुबीरा अवधि मैं
Saturday, February 23, 2008
फागुन उड़त गुलाब
झूमर चौतार झमारी, तजो बनवारी
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी


धनि-धनि ए सिया रउरी भाग, राम वर पायो।
लिखि लिखि चिठिया नारद मुनि भेजे, विश्वामित्र पिठायो।
साजि बरात चले राजा दशरथ,
जनकपुरी चलि आयो, राम वर पायो।
वनविरदा से बांस मंगायो, आनन माड़ो छवायो।
कंचन कलस धरतऽ बेदिअन परऽ,
जहाँ मानिक दीप जराए, राम वर पाए।
भए व्याह देव सब हरषत, सखि सब मंगल गाए,
राजा दशरथ द्रव्य लुटाए, राम वर पाए।
धनि -धनि ए सिया रउरी भाग, राम वर पायो।



शुभ कातिक सिर विचारी, तजो वनवारी।
जेठ मास तन तप्त अंग भावे नहीं सारी, तजो वनवारी।
बाढ़े विरह अषाढ़ देत अद्रा झंकारी, तजो वनवारी।
सावन सेज भयावन लागतऽ,
पिरतम बिनु बुन्द कटारी, तजो वनवारी।
भादो गगन गंभीर पीर अति हृदय मंझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फंसे मुरारी, तजो वनवारी।
कातिव रास रचे मनमोहन,
द्विज पाव में पायल भारी, तजो वनवारी।
अगहन अपित अनेक विकल वृषभानु दुलारी,
पूस लगे तन जाड़ देत कुबजा को गारी।
आवत माघ बसंत जनावत, झूमर चौतार झमारी, तजो वनवारी।
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी,
नहिं भावत बिनु कंत चैत विरहा जल जारी,
दिन छुटकन वैसाख जनावत, ऐसे काम न करहु विहारी, तजो वनवारी।

प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 10:17 PM 0 टिप्पणियाँ
लेबल: ई हमार नइखे, कविता कोश से ले के देत हईं साभार बा ना
Thursday, February 21, 2008
अंखिया क पुतरी

अंखिया क पुतरी
करेजवा में उतरी
विदेशिया क सुघरी
सगरवा में उतरी
उतरी हो रामा
पुतरी हो रामा
रामा हो रामा....

सूने-सूने डिहवा
मड़ैया सूनी-सूनी
कबौ देहरादूनी
त कबौ टेलीफूनी
मन भइलें खूनी-खूनी
याद आवै दूनादूनी
...अंखिया क पुतरी हो रामा

छुटि गइलैं गउवां
बिलाइ गइलैं नउवां
बालेपन क दिनवा
हो गइलैं महीनवां
नाही केहू आवै ला
ना जालै केहू उहवां
...अंखिया क पुतरी हो रामा

प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 11:25 PM 1 टिप्पणियाँ
Friday, February 8, 2008
बुढउ बाबा
boomp3.com

प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 2:36 AM 0 टिप्पणियाँ
Friday, February 1, 2008
अरे...हाऊ देखा, का होत हउवै
देखबा...देखबा...तनी देखबा-देखबा, हाऊ का होत ह, अरे एतना लोग एक साथ काहें दौड़त हउवै....ऊ कइसन कइसन लोग हउवैं....ओनके का हो गइल ह....एक दमै सनक गयल हउवैं का....कुल क कुल एकै तरह क लउकत हउवैं.....नाही-नाही....ओहमै दू तरह क लोग लउकत हउवैं....आज हमहूं देखि लेहलीं ओनके....जब पढ़ली बेहया का चिट्ठा....आवा तनी मोका निकाल के दू घड़ी तुहूं पढ़ ले जा, त जानि जइबा कि असली बात का ह...ऊ लोग कउन लोग हउवैं....ओनकर कहानी भैया चिट्ठा से उधार लेइके हम इहां आप सबन के पढ़वावत हईं...जस क तस-


(यह ताजा वाकया अमीर घराने का है) सुबह-सुबह पहले तो कुछ-एक लोगों की निगाह उस पर पड़ी, फिर चारों तरफ शोर मच गया। जिसने भी उसे देखा, आंखें फटी-की-फटी रह गईं। सबकी आंखों में एक ही सवाल कि इतना सभ्य और सुदर्शऩ होते हुए भी उसने ऐसा क्यों किया? वह खुद नंगा हुआ या किन्ही बदमाशों ने उसके साथ ये हरकत की? ...और अपनी इस करतूत से अचानक वह अनगिनत महिलाओं-पुरुषों की भीड़ की आंखों में इस तरह धंस गया कि सब-के-सब बुड़बुड़ाने लगे....................यह वाकया है नये साल के दूसरे महीने की पहली तारीख यानी 1 फरवरी की सुबह का। उसे नंगा किया अमीरों की चटोरी करने वाले बुर्जुआ मीडिया ने। उसी मीडिया ने, जो कहता है देश बहुत तेजी से विकास कर रहा है। आए दिन जो देश के अमीरों की नंबरिंग की फेहरिस्त पढ़वाता रहता है। मुद्दत बाद उसने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की एक ताजा रिपोर्ट को पहले-दसरे पन्ने पर प्रमुख स्थान दिया। इस रिपोर्ट ने भारतीय लोकतंत्र को नंगा कर दिया। उन अमीर घरानों और उनके पालतू राजनेताओं के चेहरे से एक झटके में नकाब खींच थी। रिपोर्ट के आईने में सबके सब एक साथ नंगे दौड़ते दिखे। क्या है रिपोर्ट में, एक नजर आप भी जान लें-
-भारत में 17 करोड़ लोग सिर्फ 19 रुपये में रोजाना गुजारा करते हैं। उत्तर प्रदेश का पूरा ग्रामीण इलाका इसी तरह जी रहा है, जबकि बिहार में ग्रामीण सिर्फ 15रुपये में रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
- भारत में लगभग 14करोड़ लोग सिर्फ 12रुपये या इससे भी कम रुपये से रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
-पंजाब और हरियाणा सबसे खुशहाल माने जाते हैं, मीडिया भी इनकी खूब दुंदभी बजाता रहता है, लेकिन नंगी हकीकत ये है कि पंजाब में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 33रुपये और हरियाणा में 25रुपये है।
-रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय ग्रामीण एक महीने में 251रुपये से अपने को जिंदा रखता है।
-ग्रामीणों की आधी आबादी कच्चे या अधपक्के घरों में जीवन बिता रही है। इनमें कच्चे घर वाले 19फीसदी हैं।
-विकास का इतना ढिंढोरा पीटा जा रहा है लेकिन आज भी शहरी आबादी के 45फीसदी लोग ही रसोई गैस पर भोजन पका रहे हैं, जबकि गांवों में 75फीसदी लोग लकड़ी के चूल्हे से काम चला रहे हैं।........इस नंगे लोकतंत्र को देखते हुए ऐसे में कुछ सवाल--कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
-आए दिन देश के अमीरों की फेहरिस्त पढ़वा कर मीडिया आखिर क्या साबित करना चाहता है?
-एक भारतीय ढाई सौ रुपये में महीना काटता है और दूसरे (अंबानी) का व्यक्तिगत मासिक खर्च सवा दो करोड़ क्यों?
-नेता और अफसर तो हैं ही, क्या वे साहित्यकार, पत्रकार, चिंतक, वक्ता, खिलाड़ी, अभिनेता, रंगकर्मी गूंगे-बहरे या दिमागी अपाहिज नहीं हैं, जो ऐसी सच्चाइयां बयान होते ही चुप्पी साध जाते हैं?

....तो भैया
आओ भारतीय लोकतंत्र की हाट सजी है
यहां हर अंग बिकाऊ है
किडनी क्या, जो चाहो खरीद लो जाओ
पहले इनकी चुप्पियां खरीदो
फिर इनकी अक्ल खरीदो
फिर जो चाहो, सब कुछ
लोकतंत्र तो कब का नीलाम हो चुका है
तन-बदन तक नीलाम हो रहा है
अब कब जागोगे
कब तक एक दूसरे से भारतीय संस्कृति और सभ्यता का
सफेद झूठ बोलते रहोगे
यदि तुम ऐसा कर रहे हो
तो इसके सिवाय तुम्हारे पास
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
...क्योंकि तुम मर चुके हो
तुम्हारी आत्मा सड़ चुकी है!
शामिल हो जाओ नंगी दौड़ में,
शामिल तो हो ही,
फास्ट फूड खाओ
दारू पीयो, सिगरेट फूंककर काफी हाउसों में गप्प हांको,
दुनिया भर की बातें करो
और देखो कि तुम कितने नंगे हो चुके हो
....उफ्! अमीरों की खुरचन ने
तुम्हे कितना नंगा कर दिया है?
सुविधाओं ने तुम्हे कितना परजीवी बना दिया है
तो खोखले जी
तुम सिर्फ नंगे ही नहीं
इतने नकली हो गए हो तुम
कि तुम्हारी ही आंखें तुम्हे देखने से मना कर देती हैं
सोचो कि एक दिन में
कितनी बार ऐसा होता है तुम्हारे साथ,
सोचो कि तुम सब कौन हो?
आखिर क्या चाहते हो?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं दिखाई देता?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं सुनाई देता?
यदि तुम सब कुछ देख-सुन कर भी
अनजाने बने हुए हो
.....तो वाकई
तुम कितने नीच हो!!


प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 12:00 AM 2 टिप्पणियाँ
पुराने पोस्ट सदस्यता लें संदेश (Atom) ब्लॉग आर्काइव
▼ 2008 (20)
▼ 03/02 - 03/09 (2)
ऐ कुतिया
कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....
► 02/24 - 03/02 (1)
फागुन में बाबा देवर लागै
► 02/17 - 02/24 (2)
फागुन उड़त गुलाब
अंखिया क पुतरी
► 02/03 - 02/10 (1)
बुढउ बाबा
► 01/27 - 02/03 (2)
अरे...हाऊ देखा, का होत हउवै
आज गांन्हीबाबा का पुन्नतीथी न हउवै, त तनी ईहो सुनल...
► 01/20 - 01/27 (2)
ए हमार छब्बीस जनवरी
कजरा
► 01/13 - 01/20 (9)
कहंरवा
फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै
अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ...तान भोजपुरिया
जय बाबा कैलाश
ई बात चंडूखाने क हउवै का?
आवा हो तनी सुनले जा...
छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै
भैया ई नया ब्लॉग ह भोजपुरी क
सपन एक देखलीं
► 01/06 - 01/13 (1)
रउआ सबके राम-राम
मेरे बारे में
भोजवानी
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

Recent Visitors
Click the map to Zoom In

Click to get FEEDJIT


Live traffic feed
Munich, Bayern arrived from blogger.com on "भोजपुरिया"
Delhi, Delhi arrived from blogvani.com on "भोजपुरिया: ऐ कुतिया"
New Delhi, Delhi arrived from blogger.com on "भोजपुरिया"
Baranagar, West Bengal arrived from blogvani.com on "भोजपुरिया: ऐ कुतिया"
Indore, Madhya Pradesh arrived from blogger.com on "भोजपुरिया"
Delhi, Delhi left via bp2.blogger.com
Delhi, Delhi arrived on "भोजपुरिया"
New Delhi, Delhi arrived from blogger.com on "भोजपुरिया"
New Delhi, Delhi arrived from tippanikar.blogspot.com on "भोजपुरिया: कबीर सारा-रा-रा-रारा-र ारा-रा-रारा...."
San Jose, California arrived from blogger.com on "भोजपुरिया"
Options>>
∙ Ignore my browser
∙ Live Traffic Map
∙ Popular Pages Today

Click to get FEEDJIT