सोमवार, 19 मई 2008

मेरे जैसे जाने कितने हैं इस हिंदुस्तान में



कवि कैलाश गौतम

तेज धूप में
तेज धूप में
नंगे पांव वह भी रेगिस्तान में,
मेरे जैसे जाने कितने
हैं इस हिन्दुस्तान में।
जोता-बोया-सींचा-पाला
बड़े जतन से देखा भाला
कटी फसल तो
साथ महाजन भी उतरे खलिहान में।
जाने क्या-क्या टूटा-फूटा हँसी न छूटी गीत न छूटा
सदा रहा
तिरसठ का नाता बिरहा और मचान में।
जीना भी है मरना भी है
मुझको पार उतरना भी है
यही सोचता रहा
बराबर बैठा कन्यादान में।

उतरे नहीं ताल पर पंछी

उतरे नहीं ताल पर पंछी
बादल नहीं घिरे
हम बंजारे
मारे-मारे दिन भर आज फिरे।
गीत न फूटा
हँसी न लौटी सब कुछ मौन रहा,
पगडन्डी पर आगे-आगे
जाने कौन रहा
हवा न डोली
छाँह न बोली ऐसे मोड़ मिले।
आर-पार का न्योता देकर
मौसम चला गया
हिरन अभागा उसी रेत में
फिर-फिर छला गया
प्यासे ही रह गये
हमारे पाटल नहीं खिले।
मन दो टूक हुआ है सपने चकनाचूर हुए
जितनी दूर नहीं सोचे थे
उतनी दूर हुए
रात गये
आँगन में सौ-सौ तारे टूट गिरे।

बारिश में घर लौटा कोई

बारिश में घर लौटा कोई

दर्पण देख रहा
न्यूटन
जैसे पृथ्वी का
आकर्षण
देख रहा।

धान-पान सी आदमकद
हरियाली लिपटी है,
हाथों में हल्दी पैरों में
लाली लिपटी है
भीतर ही भीतर कितना

परिवर्तन देख रहा।

गीत-हँसी-संकोच-शील सब
मिले विरासत में
जो कुछ है इस घर में सब कुछ प्रस्तुत स्वागत में
कितना मीठा है मौसम का

बंधन देख रहा।

नाच रही है दिन की छुवन
अभी भी आँखों में,
फूलझरी सी छूट रही है
वही पटाखों में
लगता जैसे मुड़-मुड़ कोई

हर क्षण देख रहा।

दिन भर चाह रही होठों पर,
दिन भर प्यास रही
रेशम जैसी धूप रही
मखमल सी घास रही
आँख मूँदकर
सुख सर्वस्व समर्पण देख रहा।

बीते दिन

बीते दिन
मैं भूल नहीं पाता,
था कोई जो
मुझे देखकर मई जून की तेज धूप में
मेरे आगे हो जाता था

बादल पेड़ खुला छाता।

मन से जुड़ता
चुटकी लेता ताने कसता था,
खिल उठता था ताल
चाँद पानी में हँसता था
मैं उसकी आँखों में सोता
वह मेरी साँसों में गाता।
कैसे-कैसे शहर और
कैसी यात्रायें हैं,
तेज धार में हाथ थामकर
साथ नहाये हैं
कितना सहज समर्पण था वह
कैसा था
स्वाभाविक नाता
कैसी-कैसी सीमायें थीं
कैसे घेरे थे,
शामें थीं रसवंत और जीवंत सबेरे थे
तन जैसे लहराता रहता
रस जैसे मौसम बरसाता।

छुट्टियाँ होती हैं लेकिन

छुट्टियाँ होती हैं लेकिन
क्या बतायें छुट्टियों में
हम
अब नहीं घर से निकलते रंग लेकर राग लेकर
एक आदिम आग लेकर
मुट्ठियों में हम।
धूप-झरना, फूल-पत्ते
गुनगुनाती घाटियाँ
ले गईं सब कुछ उड़ाकर
सभ्यता की आंधियाँ
घर गृहस्थी दोस्त दफ्तर
बोझ सब लगते
समय पर
जी रहे बस औपचारिक चिट्ठियों में हम।
कल्पनायें प्रेम की
संवेदनायें प्रेम की
विज्ञापनों में आ गईं
सारी ऋचायें प्रेम की
थे गीत-वंशी कहकहे
क्या-क्या नहीं भोगे सहे
ईंधन हुये
कैसा समय की भट्ठियों में हम।

बरसों बाद मिला है कोई

बरसों बाद मिला है कोई

कहाँ छिपाऊँ मैं,

केवल उसे निहारूँ
या
फिर-फिर बतियाऊँ मैं।
तनिक न बदला वही हू बहू
पहले जैसा है
बतियाने का लहजा भी
जैसा का तैसा है
सोच रहा
हँसते चहरे को और हँसाऊँ मैं।
थोड़ी सी कुछ टूटन जैसी
मन में झलक रही
बरसी नहीं घटा कजरारी
क्यारी नहीं बही
असमंजस में
घिरा हुआ हूँ क्या बतलाऊँ मैं।
बीते दिन भी इस मौके पर
ऐसे घेरे रहे,
फेर रहे हैं हाथ प्राण पर
मन से टेर रहे,
क्या-क्या फूँकूँ
एक सांस में क्या-क्या गाऊँ मैं।

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