एही कहल जाला आंख एक्को ना, कजरौटा बारह ठो। आ तनी आउर मुंहफटई से कहीं त झोरी में बाल नहीं (बाल ऊ वाला), औ चले जगन्नाथ जी। सरमायेदारन की सेवकाई में कटोरा लेइके दर-दर डोलत ई मुड़कटवन के का कहलि जाइ कि फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै। त भइया चरनबंदन चहुंओंरी....एही चारन गान पर नीचे कुछ लाइना इहां सुनावति बानी रउवा सबन के..... समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी। हाथी से आयी घोड़ा से आयी अंगरेजी बाजा बजाई...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। नोटवा से आयी वोटवा से आयी बिड़ला के घर में समायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। गांधी से आयी आंधी से आयी टुटही मड़इया उड़ायी,...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। कांगरेस से आयी जनता से आयी झंडा के बदली हो जायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। डालर से आयी रूबल से आयी देसवा के बान्हे धरायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। वादा से आयी लबादा से आयी जनता के कुरसी बनायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। लाठी से आयी गोली से आयी लेकिन अहिंसा कहायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। महंगी ले आयी गरीबी ले आयी केतनो मजूरा कमायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। छोटका के छोटहन बड़का के बड़हन बखरा बराबर लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। परसों ले आयी बरसों ले आयी हरदम अकासे तकायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। धीरे-धीरे आयी चुपे-चुपे आयी अंखियन पर परदा लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।
त भइया, गोरख पांड़े त ई कुल गावत-गावत मरि गइलैं। उनहूं के भला का मालूम रहल कि समजावाद का कमाई-धमाई खाए-खसौटे वाले दलाल टाटा की थैली में मुंह मारि-मारि के सिंदूरग्राम अउर नांदीग्राम में अपने मुंहे करिखा लगाइके थेथर की तरह घूमत बानै आजकल। आ ऊ जमाने के, पांड़े जी के जमाने के बड़े-बड़े करांतिकारी लोग दिल्ली में सहाराश्री-सहाराश्री जपत हउवैं। केहू पतरकार बनत डोलत बा, जोतीबसू का जीवनी लिखत बा त केहू एहर-ओहर पूंजी के दलालन के नाबदान में थूथुन चभोरत बा। आ जे लोग नक्सलबाड़ी में बान-धनुख तनले रहे, उनहू लोगन में केहू मीरघाट-केहू तीरघाट पर आपनि-आपनि मंडली लेके बड़ा जोरदार बहस में जुटल बा साठ साल से कि हमार असली दुसमन के हउवै। एतना साल में त आदमी चाहै त पताल खोदि नावै। धिक्कार बा उनहू लोगन के अइसन जनखा गोलइती प। सुनै में आवत ह कि ऊहो लोगन में केहू क सरदार लेबी के पइसा से अमरीकी शर्ट-बुश्शर्ट पहिनी के अरिमल-परिमल परकासन चलावत बा अपने मेहरी-लइका, साढ़ू-सढ़ुआइन के साथ त केहू तराई में टांगि भचकावत रागमल्हार में डूबलि बा। आज ले केहू से एक तिनको भर नाही उखरल। उनही लोगन में केहू अमेरिका से लौटि के बीबी के पल्लू में एनजीओगीरी करत बा त केहू बिहार अउर आन्हर परदेस के जंगलन में फालूत के धांय-धांय में आपनि ताकत झोंकले बा। अरे बेसरम, तू लोगन के चिल्लू भर पानी में डूबि मरै के चाही कि देखा नैपाल में बिना कौनो डरामा-नौटंकी कैसे बहादुरन की जमाति ने ऊ रजवा के खदेड़ि देहलस...आ तू लोगन अजादी क मशालै पढ़ावति रहि गइला। कहां गइल तोहार आइसा-फाइसा. आइपीएफ-साइपीएफ.... आखिर कब ले तोहन लोगन ढुकारि मारि के दिल्ली के कोने अतरे में फोकट का बुद्धी बघारत रहबा। तोहन लोगन त आपसै में कटि मरबा, जनता के खातिर का कइबा कट्टू? देखा कठपुतली नीयर मनमोहना कैसे चीन अमरीका धांगत हउवै, मर्द त ऊ हउवै, तोहन लोग सारी पहिनि के घूमा ससुरो। किसान मजूर क कलेजा जरी त ओकरे मुंह से ईहै कुल गारी-गुपुत निकली। मरला की हद कइ नउला तोहन लोग। खैर कौनो बात नइखैं। हमरे बस में आजि एतने हउवै कि एही तरहि से तोहन लोगन क खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में। तू लोग नगरी-नगरी द्वारे वैन प लादि के किताब कापी बेचा, क्रांति-स्रांती का नाटक-नौटकी करा, गीत-गाना का सीडी-वोडी बेचा-बिकना, आपन रोजी-रोटी चलावा, बस तोहरे लोगन से आउर कुछ उखरै-परिआए क भरोसै बेकार बा। अकारथ गइलि कुल कुरबानी। जाने केतनी सहीद लोग अपने-अपने कबर में से तोहन लोगन क ई रामलीला देखति होइहैं, जनता त देखती बाय। ई बाति तोहनो लोगन पर लागू हउवै कि... फुहरी गईल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी लगल गावै।
1 टिप्पणी:
गजब के लिखले बानी। बहते बढ़िया। लागल रहीं।
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