रविवार, 13 जनवरी 2008

सपन एक देखलीं

सूतल रहलीं
सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया।
फूटलि किरनिया
पुरुब असमनवा
उजर घर-आंगन हो सखिया।
अखिया के नीरवा
भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया।
गोसयां के लठिया
मुरइया अस तोरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया।
केहू नाहीं ऊंच-नीच
केहू का ना भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया।
बइरी पइसवा के
रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया।
(इ गोरख पांड़े क गीत हउवै)

1 टिप्पणी:

VIMAL VERMA ने कहा…

बहुतै नीक ह,इ हम गोरखजी के मुंह से सुनले बानी,मन तर हो गईल,वाह वाह,फ़ेनी से याद दिलावे खातिर रऊआ धन्यवाद के पात्र हईं!!